हिंदी भाषा शिक्षण विधियां भाषा संसर्ग विधि
7 भाषा संसर्ग विधि - भाषा शिक्षण में जब एक बालक को बिना वर्णमाला का ज्ञान करवाएं शब्दों का ज्ञान दिया जाता है तो कम से कम समय में बालक को पुस्तक पढ़ना सिखा दिया जाता है तो यह भाषा संसर्ग विधि होती है
■ सर्वप्रथम 1992 ईस्वी में लोक जुंबिश परियोजना के माध्यम से भारत देश में भाषा संसर्ग विधि का प्रचलन शुरू हुआ और वर्तमान में एक बालक को कम से कम समय में पढ़ना लिखना सिखा दिया जाता है
■ लार्ड मैकाले भाषा संसर्ग विधि के समर्थक माने जाते हैं
भाषा संसर्ग विधि के गुण
● प्राथमिक कक्षाओं में व्याकरण पढ़ाने की यही प्रणाली लाभदायक है
● व्याकरण के नियमों का ज्ञान कराए बिना भाषा के शुद्ध रूप का अनुकरण करने का अवसर प्रदान कर छात्रों को भाषा के शुद्ध रूप का प्रयोग करना सिखाया जाता है
● इसके द्वारा प्राथमिक कक्षाओं में रचना तथा अभ्यास द्वारा भाषा का शुद्ध प्रयोग किया जाता है
● इस विधि में व्याकरण का सैद्धांतिक ज्ञान न दिया जाकर व्यवहारिक ज्ञान पर बल दिया जाता है
● बालक में शब्द ज्ञान शीघ्रता से पैदा होता है बालक कम समय में पुस्तक पढ़ने लग जाता है
भाषा संसर्ग विधि के दोष -
◆ इस विधि का प्रयोग करने से बालक में वर्णमाला का ज्ञान विकसित नहीं हो पाता
◆ बालक में व्याकरणीय अशुद्धता पैदा हो जाती है
◆ क्रमबद्ध व व्यवस्थित ज्ञान देने में सक्षम नही है
8 समवाय विधि- समवाय से अभिप्राय उस शिक्षा से है जिसमें एक बालक को अपने सामाजिक धार्मिक आर्थिक व्यवसाय एवं औद्योगिक क्षेत्रों को सम्मिलित करते हुए शिक्षा प्रदान की जाए जिससे कि बालक शिक्षा प्राप्ति के बाद उस दिशा में प्रगति कर सके जिसके लिए वह अपने सामाजिक जीवन और समाजिक व्यवहारों को समझते हुए समायोजित या संतुलित जीवन आधार प्राप्त कर सके
■ सबसे पहले इस प्रकार का विचार 19वीं सदी में फ्रोबेल के द्वारा दिया गया जिन्होंने कहा कि बालक को जीवन केंद्रित शिक्षा दी जानी चाहिए
■ 20वीं सदी के प्रारंभ में अमेरिकी विद्वान जॉन डीवी ने सांमजसीकरण की शिक्षा का विचार दिया जिसके अनुसार एक बालक की शिक्षा का उद्देश्य उसको सामाजिक वातावरण में संतुलित बनाए रखने से संबंधित हो
◆ उपयुक्त विचारों से प्रभावित होकर थार्नडाइक , स्किनर, गेट्स आदि ने समवाय का विचार दिया जिनके अनुसार तत्कालिक वातावरण को अथवा समसामयिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए शिक्षा की व्यवस्था हो
■ उपयुक्त विचारों का प्रभाव भारतीय दार्शनिक गांधीजी पर आया और उन्होंने 1937 में बुनियादी शिक्षा की अवधारणा दी और उन्होंने अपने अभिन्न मित्र डॉक्टर जाकिर हुसैन को वर्धा में रहते हुए इस अवधारणा को आगे बढ़ाने के लिए कार्य सौंपा , जहाँ उन्होंने 1937 से 1940 के बीच कार्य करते हुए इस अवधारणा को भारतीय शिक्षा में समाहित किया
समवाय विधि के गुण
◆ छात्र को मिले-जुले पाठ्यपुस्तक का ज्ञान कराना
◆ जीवन केंद्रित शिक्षा का ज्ञान कराना
◆ सामंजस्यीकरण पर बल
◆ बुनियादी शिक्षा पर बल
समवाय विधि के दोष
● व्याकरण के नियमों का तार्किक एवं व्यवस्थित ज्ञान नहीं दिया जा सकता
● मूल पाठ से भटक जाने का भय बना रहता है
9 प्रश्नोत्तर विधि - शिक्षण की इस विधि में संपूर्ण पाठ का विकास छोटे-छोटे प्रश्नों से किया जाता है
◆ इस विधि में शिक्षक पाठ के प्रत्येक गद्य या पंक्ति पर वस्तुनिष्ठ अथवा अति लघु प्रश्नों की रचना करता है
◆ शिक्षक छात्रों से प्रश्न पूछ कर अपने पाठ का विकास करता है
◆ छात्र शिक्षक द्वारा तैयार किए गए प्रश्नों के उत्तर देते हुए आगे बढ़ता है
◆ यह विधि भाषा अध्ययन के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती है
◆ इस विधि के जन्मदाता सुकरात माने जाते हैं
◆ शिक्षक इस प्रकार से प्रश्न पूछता है कि छात्रों में रुचि और जिज्ञासा बनी रहे
प्रश्नोत्तर विधि के गुण
◆ बालक में विश्वास की भावना जागृत होती है और संकोच की प्रवृत्ति भी समाप्त होती है
◆ बालक में जिज्ञासा बनी रहती है इस विधि में शिक्षक बालकों का मूल्यांकन भी साथ-साथ करता जाता है
◆ बालक में सोचने समझने तर्क करने की क्षमता का विकास होता है
◆ पाठ्यक्रम को नियत समय में आसानी से पूरा किया जा सकता है
प्रश्नोत्तर विधि के दोष
● विद्यार्थी को प्रश्न पूछने की शंका नहीं रहने के कारण वह कभी-कभी विषय से अलग प्रश्न पूछ लेता है
◆ यह उच्च स्तर पर ही उपयोगी है
◆ कभी-कभी छात्रों द्वारा अत्यधिक एक साथ प्रश्न पूछने पर बाहर से देखने वाले को शिक्षण कार्य ठीक चलता प्रतीत नहीं होता
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