सम्पूर्ण अधिगम यूनिट 4

 अधिगम=अधिगम शब्द अंग्रेजी के LEARNING का हिंदी रूपांतरण है जिसका शाब्दिक अर्थ - सीखना अथवा ग्रहण करना होता है


★ बालक अपने जन्म से वृद्धावस्था तक निरंतर सीखता रहता है

★ अधिगम एक निरंतर चलने वाली सार्वभौमिक प्रक्रिया है 

★ अधिगम किसी स्थिति के प्रति की जाने वाली अनुक्रिया को कहते हैं 

★ अर्जित या सिखी गयी अनुक्रिया ही अधिगम कहलाती है

★ सामान्य शब्दों में अधिगम का शाब्दिक अर्थ सीखना, सीख कर व्यवहार में परिवर्तन करनानवीन ज्ञान अर्जित करने की प्रक्रिया से होता है

परिभाषाएं

■ वुडवर्थ के अनुसार- 1 नवीन ज्ञान अर्जन करने की प्रक्रिया अधिगम है 
2 सीखना विकास की प्रक्रिया है 

■ गिलफोर्ड के अनुसार -  व्यवहार के द्वारा व्यवहार में परिवर्तन ही अधिगम है 

■ गेट्स के अनुसार - अनुभव एवं प्रशिक्षण के माध्यम से व्यवहार में परिवर्तन अधिगम कहलाता है
 
■ क्रो एंड क्रो के अनुसार - आदत, ज्ञान, अभिरुचि एवं अभिवृत्ति में वृद्धि की प्रक्रिया अधिगम कहलाती है

■ क्रोनबेक के अनुसार - अनुभव के परिणाम स्वरूप व्यवहार में परिवर्तन अधिगम कहलाता है 

■ पावलाव के अनुसार - अनुकूलित अनुक्रिया के परिणाम स्वरुप व्यवहार में परिवर्तन अधिगम कहलाता है

■ स्किनर के अनुसार - सीखना व्यवहार में उत्तरोत्तर सामंजस्य की प्रक्रिया है


अधिगम की विशेषताएं- 

■ अधिगम अर्जित प्रक्रिया है

■ अधिगम सक्रिय अनुक्रिया है 

■ अधिगम निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है 

■ अधिगम सार्वभौमिक प्रक्रिया है

■ अधिगम वातावरण की उपज है

■ अधिगम अनुभवों का संगठन है 

■ अधिगम मानसिकता में वृद्धि करने की प्रक्रिया है

■ अधिगम का स्थानांतरण किया जा सकता है

■ अधिगम मानव व्यवहार में परिवर्तन करने वाली प्रक्रिया है

■ अधिगम सदैव उद्देश्य पूर्ण होता है

■ अधिगम व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास में सहायक है

■ अधिगम में समय अधिक लगता है

■ अधिगम व्यवहार में उत्तरोत्तर सामंजस्य की प्रक्रिया है

■ अधिगम से अपेक्षाकृत स्थाई परिवर्तन होता है

■ अधिगम सकारात्मक और नकारात्मक दोनों होता है

■ अधिगम एक क्रियात्मक प्रक्रिया है

अधिगम के सोपान -
1 अभिप्रेरणा 
2  लक्ष्य 
3  बाधाएं
4  तत्परता 
5  अधिगम स्थिति 
6  विभिन्न अनुक्रियाएँ 
7  पुनर्बलन  
8 अनुभवों का संगठन 
9 उद्देश्यों की प्राप्ति/ व्यवहार में स्थाई परिवर्तन

अधिगम वक्र -
★ अधिगम वक्र का सर्वप्रथम प्रयोग ऐबिगहास व जेरोम ब्रूनर ने किया 
★अधिगम वक्र से आशय बालक बालिकाओं द्वारा किए जाने वाले अभ्यास के उपरांत सीखी जाने वाली विषय वस्तु की मात्रा को बताने वाले वक्र को अधिगम वक्र कहते हैं

अधिगम वक्र चार प्रकार के होते हैं

सरल रेखीय वक्र- बालकों द्वारा प्रारंभिक दशा में किए गए अभ्यास में निरंतर वृद्धि करने पर अधिगम की मात्रा में भी वृद्धि होने लगती है जिससे अधिगम रेखा एक सरल रेखा के रूप में प्राप्त होती है इसके कारण बनने वाला वक्र सरल रेखीय वक्र कहलाता है 
■ यह प्रतिभाशाली बालकों का वक्र कहलाता है

उन्नतोदर/ नकारात्मक/ ऋणात्मक वक्र - प्रारंभिक दशा में बहुत ही कम अभ्यास करने के उपरांत भी अधिगम की मात्रा में अत्यधिक वृद्धि होती है परंतु अभ्यास न होने के कारण अधिगम रेखा धीरे-धीरे झुकने लगती है जिससे अधिगम का पठार का निर्माण होता है तथा अधिगम का पठार अधिगम निर्योग्यता को दर्शाता है अधिगम का पठार बनने के बाद अधिगम रेखा पुनः छैतिज में मिल जाती है इस कारण इस से बनने वाला वक्त ऋणात्मक वक्र कहलाता है
■ यह पिछड़े बालकों का वक्र होता है

धनात्मक/ नतोदर/वर्धन वक्र - प्रारंभिक दशा में बहुत ही अधिक अभ्यास करने के उपरांत भी अधिगम की मात्रा में बहुत ही कम वृद्धि होती है परंतु अभ्यास की मात्रा में और अधिक वृद्धि करने पर धीरे-धीरे अधिगम की मात्रा में वृद्धि होने लगती है इस कारण इस से बनने वाले वक्र को नतोदर, वर्धन या धनात्मक वक्र कहते हैं 
यह सामान्य बालकों का वक्र बनता है

मिश्रित/ S आकृति वक्र- बालकों के द्वारा अपने अभ्यास में निरंतर कमी या वृद्धि करने के उपरांत अधिगम की मात्रा में भी कमी या वृद्धि होने लगती है इससे बनने वाला वक्र मिश्रित वक्र कहलाता है
■ यह सृजनात्मक बालकों का वक्र होता है


अधिगम अंतरण = जब एक स्थिति में सीखा हुआ ज्ञान  दूसरी स्थिति में प्रयोग किया जाता है तो उसे अधिगम अंतरण कहते हैं

■ पूर्व में सीखी गई विषय वस्तु का अनुप्रयोग नवीन परिस्थितियों में करना ही अधिगम का स्थानांतरण कहलाता है

1 सकारात्मक अधिगम अंतरण =जब एक स्थिति में सीखा हुआ ज्ञान किसी दूसरी स्थिति में सहायता प्रदान करता है तो इसे सकारात्मक या धनात्मक स्थानांतरण कहते हैं 
उदाहरण -  ★गणित विषय का ज्ञान भौतिकी के ज्ञान में सहायक होता है
★ साइकिल चलाने वाला स्कूटर चलाना आसानी से सीख जाता है

2 नकारात्मक स्थानांतरण= जब एक स्थिति में सीखा हुआ ज्ञान की दूसरी स्थिति में बाधा उत्पन्न करता है तो इसे नकारात्मक या प्रतिकूल स्थानांतरण कहते हैं
 उदाहरण ★अमेरिका के ड्राइवर को भारत में कार चलाने में बाधा उत्पन्न होती है

3 शून्य स्थानांतरण= जब एक स्थिति में सिखा हुआ ज्ञान, दूसरी स्थिति में न तो सहायता प्रदान करता है और ना ही बाधा उत्पन्न करता है शून्य स्थानांतरण कहते हैं
 उदाहरण - ★क्रिकेट मैच में बैटिंग का ज्ञान बोलिंग में सहायक नहीं होता है और ना ही किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न करता है


संरचनावाद के अनुसार

1 क्षैतिज स्थानांतरण - किसी एक परिस्थिति में सीखे गए ज्ञान का प्रयोग उसी के समान किसी दूसरी परिस्थिति में करना क्षैतिज स्थानांतरण कहलाता है
 
उदाहरण- वर्ण सीख कर व्याकरण सीखना

2 उर्ध्व स्थानांतरण - किसी निम्न परिस्थिति में अर्जित ज्ञान का प्रयोग उच्च परिस्थिति में करना उर्ध्व स्थानांतरण कहलाता है

उदाहरण- सातवीं कक्षा के बालक से दसवीं का प्रश्न पत्र हल करवाना
3 द्विपार्श्व स्थानांतरण - किसी एक परिस्थिति में अर्जित ज्ञान का प्रयोग सभी परिस्थितियों में समान रूप से करना द्विपार्श्व स्थानांतरण कहलाता है

उदाहरण- एक दिन डंडे से मार खाने के बाद छात्र का दूसरे दिन शिक्षक के हाथ में डंडा देखते ही डर जाना

अधिगम स्थानांतरण के सिद्धांत

1 मानसिक शक्तियों  के स्थानांतरण का सिद्धांत =
     समर्थक - जॉन लॉक 

2 समरूप तत्व का सिद्धांत =
     प्रतिपादक - थोर्नडाइक
 
3 सामान्यीकरण का सिद्धांत 
     प्रतिपादक  - C H जड़ 

4 आदर्शों व मूल्यों का सिद्धांत 
     प्रतिपादक -  डब्लू सी बागले

5 दो तत्व स्थानांतरण सिद्धांत
    प्रतिपादक - स्पीयर मैन

अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक =

छात्र से संबंधित कारक =
◆ अभिप्रेरणा
◆ सीखने की इच्छा शक्ति
◆ आयु एंव परिपक्वता
◆ बुद्धि
◆ अभ्यास
◆ सीखने का समय
◆ शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य
◆ सीखने वाले की अभिवृत्ति
◆ सीखने की विधि
◆ सीखने की अवधि
◆ शैक्षिक पृष्ठभूमि

शिक्षक से संबंधित कारक
◆ शिक्षक का व्यक्तित्व
◆ विषय वस्तु का ज्ञान
◆ मनोविज्ञान का ज्ञान
◆ छात्र शिक्षक संबंध
◆ विषय वस्तु का प्रस्तुतीकरण
◆ अनुभव
◆ समय सारणी

विषय वस्तु से संबंधित कारक
◆ विषय वस्तु का क्रम 
◆ विषय वस्तु की भाषा शैली
◆ विषय वस्तु की उद्देश्य पूर्णता
◆ विषय वस्तु की स्पष्टता
◆ विषय वस्तु का स्वरूप
◆ विषय वस्तु की प्रकृति
◆ विषय वस्तु का आकार

वातावरण से संबंधित कारक
◆ परिवार
◆ विद्यालय
◆ खेल का मैदान
◆ वातावरण

अधिगम निर्योग्यता

 जिन बालकों को भाषा को लिखने, पढ़ने, समझने आदि में शारीरिक, मानसिक या अन्य किसी कारण से बाधा उत्पन्न होती है अधिगम निर्योग्यता कहलाती है, ऐसे बालकों को वर्तनी संबंधी अशुद्धियां व  अंकगणितीय गणना करने में भी बाधा उत्पन्न होती है ऐसे बालकों के पीछे मानसिक सरंचना व क्रियाकलापों में विभेद होना भी एक कारण है 

■ अधिगम निर्योग्यता निम्न प्रकार की होती है

1 डिसग्राफिया - लेखन संबंधी अक्षमता

2 डिसलेक्सिया - पठन या वाचन  संबंधी अक्षमता

3 डिस्केलकुलिया - गणितीय विकार 

4 डिस्प्रेक्सिया - लेखन पठन व गणितीय विकार

5 अफेजिया - भाषाघात का होना

अधिगम के सिद्धांत

 1 व्यवहारवाद के अनुसार

1 उद्दीपक अनुक्रिया सिद्धांत- (stimulus response theory)=प्रवर्तक- थोर्नडाइक (अमेरिका )

अन्य नाम-
 ★ आवर्ती का सिद्धांत 
 ★ S-R THEORY
 ★ सुख - दुख का सिद्धांत 
 ★ प्रयास व त्रुटि का सिद्धांत
 ★  बंध सिद्धांत
★ संबंधबाद/ संयोजन वाद का सिद्धांत

■ उद्दीपक अनुक्रिया से आशय-  किसी उद्दीपक के माध्यम से अनुक्रिया का प्रारंभ होना ही उद्दीपक अनुक्रिया कहलाता है 
◆थोर्नडाइक ने अपने सिद्धांत में उद्दीपक की उपस्थिति पर बल दिया

◆थोर्नडाइक के अनुसार उद्दीपक के अभाव में अनुक्रिया प्रारंभ नहीं हो सकती

◆थोर्नडाइक ने अपने सिद्धांत का प्रतिपादन करने हेतु भूखी बिल्ली पर प्रयोग किया

◆थोर्नडाइक ने निष्कर्ष निकाला कि मछली की गंध से प्रभावित होकर बिल्ली अनुक्रिया करती है और अनुक्रिया करते करते दरवाजा खोलना सीख जाती है इसी प्रकार व्यक्ति भी सही दिशा में निरंतर प्रयास करता है तो वह उस कार्य या व्यवहार को सीख जाता है

◆थोर्नडाइक के सिद्धांत में बिल्ली प्रेरक की पूर्ति हेतु अनुक्रिया करती है तथा इसमें अभिप्रेरणा प्रत्यक्ष होती है 

★ यह सिद्धांत निरीक्षण प्रणाली पर आधारित है


■थोर्नडाइक ने अपने सिद्धांत का प्रतिपादन करने हेतु 3 मुख्य नियम बताएं

 1 तत्परता का नियम - थोर्नडाइक के अनुसार किसी भी कार्य को करने के लिए व्यक्ति को सर्वप्रथम तत्परता उत्पन्न करनी चाहिए क्योंकि तत्परता के अभाव में कभी भी सफलता प्राप्त नहीं हो सकती 
उदाहरण - छोटे बालकों को पढ़ने के लिए बिठाया जा सकता है लेकिन पढ़ाया नहीं जा सकता
थोर्नडाइक के इस नियम को अभिप्रेरणा/मनोवृत्ति/मानसिकता का नियम भी कहते हैं
2 अभ्यास का नियम -थोर्नडाइक के अनुसार बालक को किसी भी कार्य को करने के लिए निरंतर अभ्यास करते रहना चाहिए क्योंकि अभ्यास के अभाव में सफलता नहीं मिल सकती
 उदाहरण - कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती 
इसके दो उपनियम हैं 
 (a) उपयोगिता का नियम - व्यक्ति उसी वस्तु के लिए अभ्यास करता है जो उसके लिए महत्वपूर्ण है
 उदाहरण - किसान के लिए उपजाऊ भूमि

 (ब) अनुपयोगिता का नियम - व्यक्ति उस वस्तु के लिए कभी भी अभ्यास प्रारंभ नहीं करता जो उसके महत्व या उपयोग की ना हो
उदाहरण-  किसान के लिए बंजर भूमि

3 प्रभाव का नियम -थोर्नडाइक के अनुसार व्यक्ति के द्वारा उसी विषय वस्तु के लिए प्रयास किया जाता है जो उसे प्रभावित करती है 
उदाहरण - सफलता द्वारा सफलता प्राप्त करना 
10 वीं में मेरिट में आने के बाद 12 वीं में मेरिट में आने का प्रयास करना

थोर्नडाइक ने अपने सिद्धांत में 5 गौण नियम भी बताएं
1 बहु प्रतिक्रिया का नियम - इस नियम के अनुसार व्यक्ति को किसी भी कार्य को करने के लिए निरंतर एक से अधिक बार प्रयास करते रहने की आवश्यकता होती है 
जैसे -किसी प्रतियोगी छात्र द्वारा लाखों प्रशन याद करना

2 आंशिक क्रिया का नियम - इस नियम के अनुसार बालक को किसी विषय वस्तु का शिक्षण कराने से पूर्व विषय वस्तु को छोटे-छोटे भागों में विभक्त कर सिखाया जाता है 
उदाहरण - बूंद बूंद से घड़ा भरता है
 यह नियम अंश से पूर्ण की ओर प्रकट करता है

3 मानसिक विन्यास का नियम- इस नियम के अनुसार किसी भी कार्य को करने से पूर्व व्यक्ति की मानसिकता का होना आवश्यक है 
उदाहरण - मन के हारे हार है मन के जीते जीत
 यह तत्परता के नियम का भाग माना जाता है

4 आत्मीकरण का नियम- पूर्व अनुभव को ध्यान में लाकर नवीन कार्य करने की मानसिक प्रक्रिया आत्मीकरण कहलाती है 
जैसे -घर पर अपने छोटे भाई बहनों को पढ़ाना

5 साहचर्य परिवर्तन का नियम- सीखने सिखाने की प्रक्रिया में आंशिक परिवर्तन कर सिखाने की प्रक्रिया साहचर्य परिवर्तन कहलाती है
 उदाहरण-  एकलव्य द्वारा धनुष विद्या सीखना


शैक्षिक महत्व
★ छोटे बालकों को सिखाने में सहायक
★ पुनरावृति की क्रिया पर बल
★ अच्छी आदतों के निर्माण में सहायक
★ मंद गति से सीखने वालों के लिए विशेष उपयोगी
★  गामक कौसलो सुनना, तैरना, साइकिल चलाना, गाड़ी चलाना, टाइपिंग सीखना, टाई की गांठ बांधना आदि कौशल प्रयास में त्रुटि पर आधारित है
★ अभ्यास की क्रिया पर आधारित

2 अनुकूलित अनुक्रिया का सिद्धांत = प्रवर्तक पॉवलाव (रूस) 
अन्य नाम -
 ◆ अनुकूलन सिद्धांत
 ◆ शास्त्रीय सिद्धांत 
 ◆ अधिगम का प्राचीन सिद्धांत
 ◆ संबंध प्रत्यावर्तन सिद्धांत 
 ◆ क्लासिकल थ्योरी 
 ◆ C-R THEORY
 ◆ अनुबंधन सिद्धांत

 ■ पॉवलाव एक शरीर शास्त्री था

 ■ पॉवलाव  को अनुबंधन का जनक माना जाता है
 ■ पॉवलाव को अनुबंधन के कारण ही 1904 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया

★पावलाव ने कुत्ते की लार ग्रंथि पर प्रयोग किया


अनुकूलित अनुक्रिया =  पॉवलाव के अनुसार जो क्रिया पूर्व में भोजन के साथ हो रही थी वही क्रिया अब घंटी के माध्यम से भी होने लगे तो उसे अनुकूलित अनुक्रिया कहते है

अस्वाभाविक उद्दीपक ------------ स्वाभाविक क्रिया
 Example

 1  भोजन --------- कुत्ता ---------  लार
      UCS----------------------------UCR

 2  घण्टी +भोजन ----कुत्ता ------- लार
      CS + UCS--------------------UCR
 
 3 घण्टी------------- कुत्ता-----------लार
     CS--------------------------------CR

पॉवलाव ने अपने सिद्धांत का प्रतिपादन करते समय दो प्रकार की क्रिया बताई
1  स्वाभाविक
2 अस्वाभाविक

★ पावलाव के सिद्धांत में घंटी के माध्यम से लार का आना एक अस्वाभाविक क्रिया है अतः घंटी एक अनुकूलित या अनुबंधित या अस्वाभाविक उद्दीपक है 

■ पावलाव के अनुसार अनुकूलित अनुक्रिया के लिए अनुबंधन का होना अति आवश्यक है
 
■ पुनरावृति के आधार पर निर्मित किया अनुबंधन कहलाती है 



विलोपीकरण  - अनुक्रिया में लंबे समय तक स्वभाविक उदीपक प्रस्तुत न करने पर अनुबंधन समाप्त हो जाता है अतः अनुबंधन समाप्त होने की प्रक्रिया विलोपीकरण कहलाती है
 आदत का बनना अनुबंधन है जबकि आदत का छूटना विलोपीकरण है
उद्दीपक सामान्यकरण - पॉवलाव के अनुसार मिलती-जुलती परिस्थितियों में अनुक्रिया का प्रारंभ होना उद्दीपक सामान्यकरण कहलाता है
उदाहरण सांप देखने के बाद रस्सी से भी डर जाना

उद्दीपक विभेदीकरण - दो उद्दीपको में समानता - असमानता का पता लगाना उद्दीपक विभेदीकरण कहलाता है

समय कारक - पॉवलाव के अनुसार दो उद्दीपको के मध्य अनुबंधन कराने हेतु अधिकतम 5 सेकंड का ही अंतराल होना चाहिए इससे अधिक अंतराल होने पर अनुबंधन नहीं होगा

बुद्धि कारक - पॉवलाव के अनुसार मंदबुद्धि बालक को अधिगम नहीं करवाया जा सकता, क्योंकि मंदबुद्धि बालकों में अनुबंधन करने की क्षमता नहीं होती

पुनःप्रकटीकरण - जब कोई व्यवहार विलोपित हो जाता है तो उस प्राणी को US+UCR उद्दीपक दे दिया जाता है तो उसका विलोपित व्यवहार पुनः प्रकट हो जाता है


शैक्षिक महत्व
 ■पुनरावृति की क्रिया पर बल
■अच्छी आदतों के निर्माण में सहायक
■ जानवरों के प्रशिक्षण में सहायक 
■ छोटे बालकों को सिखाने में सहायक
 ■अक्षर व भाषाई ज्ञान सिखाने में सहायक


3 क्रिया प्रसूत अनुबंधन = प्रतिपादक स्किनर
अन्य नाम
 ◆ नैमित्तिक अनुबंधन का सिद्धांत
◆ सक्रिय अनुबंधन का सिद्धांत
◆ R-S THEORY

■ स्किनर का यह सिद्धांत थोर्नडाइक व क्लार्क हल के सिद्धांत पर आधारित है

★स्किनर ने हल के सिद्धांत से पुनर्बलन तत्व को स्वीकार किया

■ क्रिया प्रसूत से आशय = वह व्यवहार जिसका संचालन बिना किसी प्रत्यक्ष उद्दीपक के व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर करता हो क्रिया प्रसूत कहलाता है 

◆ स्किनर ने अपने सिद्धांत के माध्यम से कहा कि प्राणी को बिना उद्दीपक दिखाएं किसी अनुक्रिया से जोड़ा तल सकता है लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि प्राणी को क्रिया के तुरंत बाद प्रोत्साहन मिले तो वह प्राणी उसकी क्रिया को सफलतापूर्वक कर लेता है

■ स्किनर ने अपने सिद्धांत में निरंतर अनुक्रिया करते रहने पर विशेष दिया, बालकों को निरंतर अनुक्रिया करते रहना चाहिए तथा अनुक्रिया के मध्य या समाप्ति के बाद उन्हें तत्काल पुनर्बलन प्रदान करना चाहिए ऐसा करने से उनकी त्रुटियों की मात्रा में कमी होने लगती है तथा उनका अधिगम प्रभावी हो जाता है

★ स्किनर ने अपने सिद्धांत का प्रतिपादन करने हेतु चूहे व सफेद कबूतर पर प्रयोग किया

◆ स्किनर ने अपने सिद्धांत में चार प्रकार के पुनर्बलन बताएं
1 क्रमिक पुनर्बलन
2 निश्चित अनुपात पुनर्बलन
3 निश्चित अंतराल पुनर्बलन
4 परिवर्तन शील पुनर्बलन

★स्किनर के अनुसार बालक को नकारात्मक रूप से पुनर्बलन नहीं प्रदान करना चाहिए क्योंकि नकारात्मक पुनर्बलन द्वारा बालक में हीन भावना का विकास हो जाता है

● स्किनर ने अपने सिद्धांत के प्रतिपादन करने हेतु दो प्रकार के व्यवहार बताएं

प्रतीकात्मक व्यवहार= जिस का संचालन सीधा उदीपक के माध्यम से होता है

 उदाहरण - आंख में तिनका गिरने पर आंख से आंसू आना


क्रिया प्रसूत व्यवहार= वह व्यवहार जिस का संचालन व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर करता है 

उदाहरण- टेलीफोन की घंटी बजने पर बात करना या ना करना


पुनर्बलन - ऐसी क्रिया जो अनुक्रिया की संख्या में वृद्धि करें पुनर्बलन कहलाती है

■ पुनर्बलन की अवधारणा स्किनर द्वारा दी गई तथा पुनर्बलन सिद्धांत क्लार्क हल ने दिया

★ स्किनर ने दो प्रकार के पुनर्बलन बताएं 

 1 सकारात्मक 
 
2 नकारात्मक

पुनर्बलन अनुसूची-  इसकी अवधारणा स्किनर द्वारा दी गई

★ पुनर्बलन अनुसूची दो प्रकार की है 
  1 सतत - प्रत्येक अनुक्रिया पर पुनर्बलन देना

  2आंशिक- कुछ अनुक्रिया पर पुनर्बलन देना

 ■आंशिक पुनर्बलन दो प्रकार का होता है 
  1 अनुपात 
  2 अंतराल
शैक्षिक महत्व
1 सामान्य बालकों को सिखाने में सहायक
2 क्रिया की निरंतरता पर बल
3 अभिक्रमित अनुदेशन विधि इसी सिद्धांत पर आधारित है
4 निदानात्मक में उपचारात्मक शिक्षण में सहायक
5 मनोरोगियों के उपचार में सहायक


4पुनर्बलन का सिद्धांत - प्रतिपादक - क्लार्क हल

अन्य नाम

■ प्रबलन का सिद्धांत

■ व्यवस्थित व्यवहार का सिद्धांत 

■चालक न्यूनता सिद्धांत 

■सबलीकरण सिद्धांत


● हल का सिद्धांत थार्नडाइक व पॉवलाव के सिद्धांत पर आधारित है 

●हल ने अपने सिद्धांत में आवश्यकता पूर्ति पर सर्वाधिक बल दिया 

■ हल ने अपने प्रयोग निम्न प्रकार से किए

1 भूखी बिल्ली को puzzal बॉक्स में बिठाया वह बाहर मछली का टुकड़ा रखा तो बिल्ली ने प्रयास करते हुए दरवाजा खोला

2 बिल्ली को भरपेट भोजन करवाकर puzzal बॉक्स में बिठाया और बाहर मछली का टुकड़ा रखा परंतु इस बार बिल्ली ने दरवाजा खोलने का प्रयास नहीं किया

इन प्रयोगों के आधार पर हल ने सिद्ध किया कि बिल्ली को भूख की आवश्यकता थी तो उसने प्रयास किया परंतु जब बिल्ली को आवश्यकता नहीं थी तो उसने बाहर आने का प्रयास ही नहीं किया तथा अर्थ प्राणी उसी कार्य को बार-बार करता है जिस कार्य को करने से उसकी आवश्यकता की पूर्ति होती है और आवश्यकता पूर्ति उस प्राणी के लिए पुनर्बलन होता है

●व्यक्ति की आवश्यकता कभी समाप्त नहीं होती है अतः व्यक्ति की सीखने की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती 

●हल के अनुसार व्यक्ति अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए व्यवस्थित एंव क्रमबद्ध रूप से व्यवहार करता है 

● स्किनर ने लिखा कि आज तक का अधिगम का हल का सिद्धांत सर्वश्रेष्ठ सिद्धांत है

■ लेस्टर एंडरसन के अनुसार-  हल का सिद्धांत नपे तुले शब्दों का सिद्धांत है

शैक्षिक महत्व

1 आवश्यकता आपूर्ति पर बल

2 बालक को आवश्यकता अनुसार शिक्षण देना चाहिए

3 सकारात्मक पुनर्बलन पर बल

4 क्रमबद्ध व्यवहार द्वारा आवश्यकता पूर्ति  संभव


5 प्रतिस्थापन सिद्धांत -  प्रतिपादक - एडविन गुथरी

★ प्रतिस्थापन से आशय - किसी पूर्व अनुभव का नवीन परिस्थितियों में अनुप्रयोग कर समस्या समाधान करने की मानसिक प्रक्रिया प्रतिस्थापन कहलाती है

■ गुथरी के अनुसार जब उद्दीपक व अनुक्रिया दोनों एक साथ प्रस्तुत हो जाए तो दोनों के मध्य एक संबंध का निर्माण हो जाता है, गुथरी ने  3 वर्षीय बालक व खरगोश पर  प्रयोग कर निष्कर्ष निकाला  कि उदीपक व अनुक्रिया के बीच समीपता स्थापित करनी चाहिए ताकि अधिगम की प्रक्रिया को प्रभावी बनाया जा सके

■ एडविन गुथरी  ने अपने सिद्धांत का प्रतिपादन करने हेतु खरगोश और चूहे पर प्रयोग किया 

■ गुथरी एक परंपरावादी मनोवैज्ञानिक हैं

 ■ गुथरी के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपने दैनिक जीवन की समस्याओं का समाधान इसी सिद्धांत के आधार पर करता है 

■ गुथरी स्किनर के सिद्धांत से असहमत थे 

■ गुथरी ने अनुभव द्वारा सीखने पर सर्वाधिक बल दिया

■ गुथरी सीखने में पुनर्बलन व अभ्यास दोनों को ही महत्वपूर्ण नहीं मानते


क्षेत्रवाद के अनुसार अधिगम के सिद्धांत 

6सामाजिक विकास सिद्धांत=    प्रवर्तक अल्बर्ट बंडूरा 

◆ समाजवादी मनोवैज्ञानिक
● सामाजिक विकास के जनक 

■ समाज द्वारा मान्य व्यवहार को स्वीकार कर एवं अमान्य
व्यवहार को त्यागना सामाजिक विकास कहलाता है 

★ बांडूरा के अनुसार बालक अनुकरण या नकल के माध्यम से सीखता है 

★ बांडूरा के अनुसार जब बालकों के सम्मुख कुछ ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती है और उन्हें यह ज्ञात नहीं हो पाता कि उन्हें क्या करना है तब बालक अपने आसपास का अवलोकन कर अन्य लोगों को देखकर वैसा ही कार्य करने लगता है इस कारण प्रोज्य सिद्धान्त  के नाम से जाना जाता है 

■ बंडूरा ने अपने सिद्धांत का प्रतिपादन करने हेतु जीवित जोकर एवं गुड़िया का प्रयोग किया

■ बंडूरा ने अपने सिद्धांत का प्रतिपादन करने हेतु 4 सोपान बताएं -
अवधान - ध्यान केंद्रित करना
2 धारण - ग्रहण करना
3 पुनः प्रस्तुतीकरण- बार बार दोहरान करना
4 पुनर्बलन- त्रुटियो में सुधार करना

■ जिसको देखकर बालक व्यवहार करना सीखता है उसे प्रतिमान मॉडल कहते हैं
★ बांडूरा ने अपने सिद्धांत का प्रतिपादन करने के लिए जीवित गुड़िया  ओर जीवित जोकर पर प्रयोग किया 
(बोबो डॉल प्रयोग)
 
शैक्षिक महत्व
◆  अनुकरण द्वारा सीखने पर बल 
◆ बालकों में सामाजिक गुणों के विकास में सहायक
◆  बालकों में अपनी सभ्यता संस्कृति का स्थानांतरण करने में सहायक 
◆ किसी मॉडल के कार्यों के आधार पर सीखने हेतु प्रेरित करना 
◆ वीर पुरुषों की जीवनियो के परिचय कराने में सहायक




7 क्षेत्रवादी/ तल रूप सिद्धांत=
  प्रतिपादक - कर्ट लेविन (क्षेत्रवाद के जनक) (रसायन शास्त्री)

■ लेविन ने बालकों को सिखाने के लिए दो तत्वों पर बल दिया 
 1 अभिप्रेरणा
 2 वातावरण 

■ सिद्धांत के अनुसार अधिगम व्यक्ति व वातावरण की अंतः क्रिया का प्रतिफल है इसलिए इसे निम्न सूत्र द्वारा समझाया गया है
★ लेविन ने अपने  सिद्धांत में निम्न सूत्र का प्रतिपादन किया -

      L = F (P × E)

  L- learning,  f- factor, 
  p- person,    E - enviornment

◆ लेविन ने अपने सिद्धांत का प्रतिपादन करने हेतु 4 सोपान बताएं
 1   आकर्षक उद्देश्य
 2   आकांक्षा का स्तर
 3   स्मृति एवं गति
 4   पुरस्कार एवं दंड

 टोपोलॉजी - गणित का शब्द जो मनुष्य के जीवन में होने वाले परिवर्तनों को व्यक्त करता है


8 आवश्यकता पदानुक्रमिक सिद्धांत = प्रतिपादक - अब्राहम मैस्लो 
★ मैस्लो के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपनी आवश्यकता पूर्ति हेतु अनुक्रिया करता है तथा जिस तत्व से आवश्यकता की पूर्ति होती है उस तत्व को सीख लेता है तथा व्यक्ति की आवश्यकताएं कभी समाप्त नहीं होती अतः सीखने की प्रक्रिया भी कभी समाप्त नहीं होती

■ मैस्लो के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपनी आवश्यकता की पूर्ति निश्चित पदक्रम में करता है तथा जब तक व्यक्ति की प्रथम आवश्यकता की पूर्ति नहीं होती तब तक व्यक्ति अपनी दूसरी आवश्यकता के बारे में विचार तक नहीं करता

★ मैस्लो ने अपने सिद्धांत में व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओं को 5 भागों में विभाजित किया 
  5  - आत्म सिद्धि
  4 -  सम्मान
  3-   संबंध
  2 -  सुरक्षा
  1-  शारीरिक

1+ 2 व्यक्तिगत आवश्यकता (निम्न स्तरीय)
3+4 सामाजिक आवश्यकता
5 विशिष्ट आवश्यकता 

अब्राहम मैस्लो के अनुसार व्यक्ति सर्वप्रथम निम्न स्तरीय आवश्यकताओं की पूर्ति करने के बाद उच्च आवश्यकताओं की पूर्ति करता है



9 अनुभवजन्य सिद्धांत - प्रतिपादक कार्ल रोजर्स 

★रोजर्स के अनुसार बालकों को उनकी किसी भी प्रकार की विषय वस्तु को सीखने से पूर्व विषय वस्तु को बालकों के प्रत्यक्ष अनुभव पर आधारित करके सिखाया जाना चाहिए क्योंकि बालक प्रत्यक्ष अनुभव द्वारा सर्वाधिक सीखते हैं ब्र

■ रोजर्स  के अनुसार के अनुसार बालकों को परंपरागत शिक्षण विधियों के स्थान पर नवीन शिक्षण विधियों द्वारा सिखाया जाना चाहिए 
उदाहरण - व्याख्यान विधि के स्थान पर भ्रमण विधि का प्रयोग 

■ एडगर डेल ने रोजर्स के सिद्धांत के समर्थन में लिखा कि बालक प्रत्यक्ष अनुभव द्वारा सर्वाधिक सीखता है 
 
■ एडगर डेल  के अनुसार बालकों के प्रत्यक्ष अनुभव द्वारा सीखने का प्रतिशत 70% होता है जबकि शब्दों के द्वारा सीखने का प्रतिशत मात्र 30% होता है 

■ एडगर डेल ने प्रत्यक्ष अनुभव द्वारा सीखने की प्रक्रिया का प्रतिपादन करने हेतु   एक अनुभवजन्य शंकु का प्रतिपादन किया 
■एडगर डेल का अनुभवजन्य शंकु नकारात्मक अधिगम प्रक्रिया को प्रकट करता है


 10 चिन्ह पूर्णकार का सिद्धांत =  प्रतिपादक -  टोलमैन 

■ टोलमैन के अनुसार बालकों को केवल शब्दों के माध्यम से ही नहीं सिखाया जा सकता उन्हें चित्र,  चिन्ह एवं संकेतों के माध्यम से भी सिखाया जा सकता है 
 
■टोलमैन के अनुसार मूकबधिर बालकों को सिखाने का यह अधिगम का सर्वश्रेष्ठ सिद्धांत है

★ अधिगम के इस सिद्धांत में बालकों को सिखाने के लिए संकेतिक भाषा के प्रयोग पर सर्वाधिक बल दिया गया
 
■ टोलमैन के अनुसार बालकों को सिखाने हेतु शारीरिक हावभाव मुखाकृति ओष्ठ विधि, चित्रांकन जैसी विषय वस्तु का प्रयोग किया गया

11 अधिगम सोपानकी सिद्धांत
प्रतिपादक - रॉबर्ट गेंने

■ अधिगम के 8 प्रकार बताएं
8 समस्या समाधान अधिगम (उच्च स्तर)
7 सिद्धांत अधिगम
6 प्रत्यय अधिगम
5 विभेद अधिगम
4 शाब्दिक अधिगम
3 श्रंखला अधिगम
2 उद्दीपक अधिगम
1 संकेत अधिगम (निम्न स्तर)

12 अर्थपूर्ण शाब्दिक अधिगम सिद्धांत-
  प्रतिपादक - आसुबेल 
■आसुबेल ने अधिगम के चार प्रकार बताएं
1 रटकर सीखना 
2 अर्थपूर्ण सीखना - समझ कर सीखना
3 अभिग्रहण सीखना- धारण करना
4 अन्वेषण सीखना- खोज कर समस्या समाधान करना

13 निर्मित वाद सिद्धांत- प्रवर्तक - जेरोम ब्रूनर 
■निर्मित वाद की उत्पत्ति जीन पियाजे के संज्ञानात्मक क्षेत्र से मानी जाती है 
■ निर्मितवाद से आशय बालक के लिए ऐसे अधिगम योग्य वातावरण का निर्माण करना जिसमें बालक अपनी विषयवस्तु सरलतापूर्वक सीख सके

■ब्रूनर के अनुसार निर्मित वाद में बालकों को किसी भी प्रकार की विषय वस्तु का शिक्षण करवाने से पूर्व विषय वस्तु के नियम, प्रकृति, उद्देश्य एवं उसके सिद्धांतों की सामान्य जानकारी बालकों को पूर्व में ही प्रदान कर देनी चाहिए ऐसा करने पर-
1 सीखना सरल हो जाता है 
2 रुचि उत्पन्न हो जाती है 
3 स्थाई ज्ञान की प्राप्ति होती है 
4 ज्ञान का स्थानांतरण संभव

निर्मित वाद की विशेषताएं- 
1 छात्र केंद्रित प्रक्रिया है
2 बालक अपने पूर्व अनुभव से ज्ञान ग्रहण करता है
3 बालक स्वयं ज्ञान का सृजन करता है
4 छात्रों की सक्रियता व तत्परता पर बल
5 बालको मैं आपसी सहयोग व साझेदारी की भावना जागृत करता है
6 बालकों के समक्ष चुनौतीपूर्ण परिस्थितियां उत्पन्न कर अधिगम करवाया जाता है
7 बालकों में उत्तरदायित्व की भावना का विकास होता है

निर्मित वाद की अवस्थाएं-
1- विधि निर्माण अवस्था-  0-2 वर्ष
■ बालक संवेदना द्वारा ज्ञान अर्जित करता है 
■बालक को बाह्य वातावरण का ज्ञान नहीं होता

2 प्रतिमा निर्माण अवस्था-  3-12 वर्ष
 ★ मूर्त चिंतन प्रारंभ होता है
 ★ प्रत्यक्ष वस्तु को देखकर वातावरण से ज्ञान ग्रहण करता है

3 चिह्न निर्माण अवस्था-  12 वर्ष के बाद 
 ★ संकेतों के माध्यम से ज्ञान ग्रहण करता है

निर्मित वाद के प्रकार
1संज्ञानात्मक निर्मितवादप्रतिपादक- जीन पियाजे 
★बालकों के ज्ञान का आधार बाह्य वातावरण की घटनाओं को माना जाता है

2 सामाजिक निर्मितवाद - प्रतिपादक - वाइगोत्सकी 
★ इसमे बालक वातावरण में घटित समाजिक घटनाओं से ज्ञान ग्रहण किया जाता है

3त्रिज्यीय निर्मितवाद -प्रतिपादक जेरोम ब्रूनर
  ■ इसमे ज्ञान ग्रहण करने का आधार बालक का स्वयं  का विवेक माना जाता है


गेस्टाल्टवाद =

◆ गेस्टाल्टवाद का उद्भव सन 1912 में हुआ लेकिन वास्तविक स्वरूप 1920 में प्रकट हुआ 

◆गेस्टाल्ट वाद का जनक मैक्स वर्दीमर को माना जाता है तथा कोहलर व कोफ़्का भी गेस्टाल्ट वाद जनक कहलाए जाते हैं

◆ गेस्टाल्टवाद जर्मन भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ समग्रकार या पूर्णाकार से होता है

14 सूझ व अंतर्दृष्टि का सिद्धांत:  प्रतिपादक - वर्दीमर/ कोहलर

■ विभिन्न नवीन परिस्थितियों में समस्या समाधान की मानसिक प्रक्रिया सूझ कहलाती है

■कोहलर के अनुसार जब व्यक्ति के सम्मुख कोई समस्या उत्पन्न होती है तो वह समस्या समाधान का प्रयास करने लगता है परंतु असफल रहता है लेकिन अपने आसपास के वातावरण परिस्थितियों का पुनः निरीक्षण कर पुनः प्रयास करने पर अचानक व्यक्ति की मानसिकता में समस्या से संबंधित समाधान उत्पन्न हो जाता है जिसे अंतर्दृष्टि या सूझ कहते हैं 

■ कोहलर के अनुसार सूझ तत्काल उत्पन्न होने वाली मानसिक प्रक्रिया है 

 कोहलर ने अपने सिद्धांत का प्रतिपादन करने हेतु सुल्तान नामक चिंपैंजी पर प्रयोग किया

★ कोहलर के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति की समस्याएं एक ही समान होती है परंतु समस्या समाधान की परिस्थितियां भिन्न-भिन्न होती है अतः नवीन परिस्थितियों में समस्या समाधान करने की मानसिक प्रक्रिया ही सूझ  कहलाती है

शैक्षिक महत्व
■ प्रतिभाशाली बालकों को सिखाने में सहायक
■ बाल केंद्रित पाठ्यक्रम का निर्माण अधिगम के इसी सिद्धांत पर आधारित है
■ पूर्ण से अंश की ओर अग्रसर
■ जटिल विषयों के शिक्षण में सहायक
■ यांत्रिक तरीके से सिखाने का विरोध करता है
■ बालकों में तार्किक क्षमता के विकास में सहायक



अभिप्रेरणा-  अंग्रेजी के motivation का हिंदी रूपांतरण है जिसकी उत्पत्ति लेटिन भाषा के motum/ movere से हुई है जिसका अर्थ है to move या गति करना 

■ किसी कार्य को प्रारंभ कर उसे जारी रख निश्चित उद्देश्य तक पहुंचाने की प्रक्रिया अभिप्रेरणा कहलाती है 

■ अभिप्रेरणा एक आंतरिक दशा है जो व्यक्ति को कार्य करने के लिए प्रेरित करती है

■ अभिप्रेरणा एक ऐसा प्रेरक बल है जो व्यक्ति को भावात्मक रूप से जागृत करते हुए लक्ष्य प्राप्त करने की ओर अग्रसर करता है, धक्का देता है अथवा गति प्रदान करता है 

■ अभिप्रेरणा मनोविज्ञान का प्रथम सिद्धांत माना जाता है 

■ अभिप्रेरणा को अधिगम का हृदय, आत्मा व राजमार्ग माना जाता है

अभिप्रेरणा की विशेषताएं

★ अधिगम का सर्वोत्तम सोपान है

★ अधिगम का स्वर्ण पथ है

★ अधिगम का सर्वोच्च राजमार्ग है

★ अधिगम का हृदय है

★ अधिगम का मुख्य चालक है

★ अभिप्रेरणा व्यक्ति में निरंतरता लाती है

★ अभिप्रेरणा अधिगम की अनिवार्य स्थिति है

★ अभिप्रेरणा एक आंतरिक उत्तेजना है जो व्यक्ति को भावात्मक रूप से जाग्रत करती है

★ अभिप्रेरणा व्यक्ति को चयनात्मक क्रिया करने के लिए प्रेरित करती है

★ अभिप्रेरणा में व्यक्ति का व्यवहार लक्ष्य निर्देशित होता है

★ अभिप्रेरणा एक साधन है साध्य नही

अभिप्रेरणा की परिभाषाएं

कार्टर गुड के अनुसार- किसी कार्य को आरंभ करने उसे जारी रखने तथा नियंत्रित करने की प्रवृत्ति ही अभिप्रेरणा है

वुडवर्थ के अनुसार - अभिप्रेरणा व्यक्ति की वह है जो किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति हेतु निश्चित व्यवहार करने के लिए प्रेरित करती है 

स्किनर के अनुसार - अभिप्रेरणा अधिगम का सर्वोच्च राजमार्ग है

क्रेचफील्ड के अनुसार- अभिप्रेरणा हमारे क्यों का उत्तर देती है

अभिप्रेरणा के स्त्रोत

1 आवश्यकता - प्रत्येक व्यक्ति की कोई न कोई आवश्यकता होती है जो उसे अभिक्रिया करने के लिए प्रेरित करती है 

उदाहरण - भोजन 

2 चालक - प्रत्येक आवश्यकता से जुड़ा एक चालक होता है उदाहरण - भोजन से जुड़ा चालक भूख

3 प्रोत्साहन- उद्दीपक सामने होने पर व्यक्ति क्रिया करने के लिए प्रेरित होता है तथा उद्दीपक के मिलने पर चालक शांत हो जाता है तथा तनाव समाप्त हो जाता है

उदाहरण-  भोजन सामग्री


अभिप्रेरणा के प्रकार

1 आंतरिक अभिप्रेरणा - अभिप्रेरणा के इस भाग में व्यक्ति अपनी शारीरिक आवश्यकता की पूर्ति करने हेतु कार्य करता है इस कारण इसे शारीरिक अभिप्रेरणा कहा जाता है 

★अभिप्रेरणा के इस भाग में व्यक्ति को कार्य करने हेतु किसी बाह्य शक्ति की आवश्यकता नहीं होती इसमें व्यक्ति स्वयं की इच्छा से कार्य करता है 

★अभिप्रेरणा के इस भाग में किया गया कार्य श्रेष्ठ होता है तथा व्यक्ति को आत्म संतुष्टि भी सर्वाधिक होती है 

प्रेरक तत्व - भूख प्यास नींद काम

 2 बाह्य अभिप्रेरणा - अभिप्रेरणा के इस भाग में व्यक्ति स्वयं की इच्छा से कार्य कर समाज में मान-मर्यादा प्रतिष्ठा को बनाए रखने हेतु कार्य करता है 

प्रेरक तत्व - दंड, पुरस्कार, निंदा, अपमान 

■ प्रेरक शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग वुडवर्थ द्वारा अमेरिका में किया गया


अभिप्रेरणा का वर्गीकरण=


थॉमसन के अनुसार 
 
प्राकृतिक अभिप्रेरणा- 
   ● संवेदना
   ● ईगो
   ● सामाजिक प्रेरणा
   ● सवेंगात्मक प्रेरणा

2 कृत्रिम अभिप्रेरणा- 
   ● प्रतियोगिता
   ● सफलता द्वारा सफलता
   ● प्रगति द्वारा पूर्व ज्ञान

अब्राहम मैस्लो के अनुसार=

1 जन्मजात-  भूख, प्यास, काम, नींद

2 अर्जित-
 (A) व्यक्तिगत- आदते, रुचि, अचेतन मन की दमित इच्छा
(B)सामूहिक- सहयोग, युयुत्सा, सामुदायिकता

गैरिट के अनुसार

1 जैविक- भूख,प्यास नींद काम

2 सामाजिक- आत्मचेतना, रचनात्मकता

3 मनोवैज्ञानिक- क्रोध, भय, प्रेम, सुख


अभिप्रेरणा के सिद्धांत

1 मूल प्रवृत्ति सिद्धांत-  मैकडूगल को मूल प्रवृत्तियों का जनक माना जाता है

■ मैकडूगल ने भय संवेग सबसे महत्वपूर्ण माना है 

■ मैकडूगल ने 14 मूल प्रवृत्तियां बताई तथा प्रत्येक मूल प्रवृत्ति का एक संवेग बताया-

   1 भय           -     पलायन
   2 क्रोध          -     युयुत्सा
   3 भूख          -     भोजनावेषण
   4  घृणा             -       निवृति
   5  आमोद          -      भोग विलास
   6  विषाद           -      संवेदना
   7  आश्चर्य            -      जिज्ञासा
   8 कृतिभाव           -     रचनात्मक कार्य
   9 वात्सल्य             -     पुत्र प्रेम
 10 कामुकता           -      काम भावना
 11 एकाधिकार        -      संचय प्रवृत्ति
 12 एकाकीपन         -      समूह की इच्छा
 13 आत्महीनता        -      शरणागति
 14 आत्माभिमान      -      आत्मगौरव की भावना

2 उपलब्धि अभिप्रेरणा सिद्धांत- प्रतिपादक - डेविड सी मैक्सीलैण्ड 

■ इस सिद्धांत के अनुसार उपलब्धि की चाह व्यक्ति को क्रिया करने के लिए प्रेरित करती है तथा व्यक्ति वहां तक पहुंचने की चाह रखता है जहां तक प्रयासों के द्वारा पहुंचा जा सकता है
■ पूर्व में अर्जित सफलता से प्रभावित होकर नवीन सफलता प्राप्त करने की मानसिक प्रक्रिया उपलब्धि अभिप्रेरणा कहलाती है
 उदाहरण 10 वीं की मेरिट 12वीं में मेरिट में आने के लिए प्रोत्साहित करती है

3 अभिप्रेरणा का सक्रियता सिद्धांत-   प्रतिपादक - सोल्सबरी, मेल्मों, लीडस्ले
 ■ मेल्मों ने व्यवहार की दक्षता के लिए मांसपेशियों की सक्रियता पर बल दिया,  मांसपेशियों की सक्रियता के बिना कार्य पूर्ण नहीं हो सकता
 
4 आवश्यकता पदानुक्रमिक सिद्धांत -  प्रतिपादक - अब्राहम मैस्लो

5 संतुलन स्थैर्य सिद्धांत - प्रतिपादक-  चैंपलिन, कोफर, एपल
 यह सिद्धांत असंतुलन की स्थिति में संतुलन बनाए रखने के लिए प्रेरित करता है 

6 अभिप्रेरणा का X-Y सिद्धांत-  डग्लस मैकग्रेगर
■ मैकग्रेगर ने व्यक्ति के कार्य करने की प्रक्रिया को X-Y अवधारणा से प्रस्तुत किया

 X  अवधारणा के लोग
 ★ स्वार्थी व स्वकेंद्रित 
 ★ धन प्राप्ति के लिए कार्य
 ★ जिम्मेदारियों व कर्तव्यों से बचना चाहते हैं

Y अवधारणा के लोग
 ★ सामाजिक प्रवृत्ति के
 ★ समाज सेवा ही कर्तव्य 
 ★ जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हटते


अभिप्रेरित करने की विधियां- 

★ प्रशंसा व निंदा द्वारा
★ सफलता का ज्ञान करवा कर
★ असफलता का भय दिखाकर
★ दंड व पुरस्कार द्वारा
★ आकांक्षा का स्तर जानकर
★ प्रतिस्पर्धा की भावना जागृत कर
★ उचित व नवीन शिक्षण विधियों का प्रयोग कर
★ अधिगम योग्य वातावरण का निर्माण कर
★ श्रव्य दृश्य सामग्रीओं का प्रयोग कर
★ उद्देश्यों का निर्धारण कर
★ विद्यालय में कक्षा के उचित वातावरण द्वारा


अधिगम में अभिप्रेरणा का महत्व

● व्यवहार को नियंत्रित करने में सहायक
● ध्यान केंद्रित करने में सहायक
● अधिगम तत्परता जागृत करने में सहायक
● अनुशासन स्थापित करने में सहायक
● मानसिक क्रियाओं के विकास में सहायक
● लक्ष्य प्राप्ति में सहायक
● चरित्र निर्माण में सहायक
● सहयोग की भावना जागृत करने में सहायक
● सृजनात्मक गुणों के विकास में सहायक
● कर्तव्यनिष्ठ बनाने में सहायक



चिंतन - किसी विषय पर सामान्य सोच विचार करने की क्षमता चिंतन कर लाती है

■  चिंतन मानसिक प्रक्रिया का ज्ञानात्मक पहलू है जिसमें आंतरिक रूप से प्रतिमा, चिह्नों, विचारों आदि के रूप में वस्तुओं और घटनाओं का मानसिक चित्रण करते हुए समस्या का समाधान ढूंढने का प्रयास किया जाता है

 रॉस के अनुसार- चिंतन मानसिक क्रिया का ज्ञानात्मक पहलू है

■ गेरिट के अनुसार - चिंतन एक अदृश्य व अव्यक्त व्यवहार है जिसमें मुख्य रुप से प्रतीकों का प्रयोग किया जाता है

■ मोहसीन के अनुसार - चिंतन समस्त समस्या समाधान संबंधी अव्यक्त व्यवहार है

■ वैलेंटाइन के अनुसार - चिंतन शब्द का प्रयोग उन क्रियाओं के लिए किया जाता है जिसमें श्रंखला वध विचार किसी पूर्व निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए निरंतर आगे बढ़ते हैं

■ कॉलसैनिक के अनुसार - संकल्पनाओं का पुनर्गठन ही चिंतन है

★ चिंतन प्रक्रिया की शुरुआत तब होती है जब व्यक्ति के सामने कोई समस्या आती है और उसका समाधान वह करना चाहता है

चिंतन की प्रकृति

◆ चिंतन सभी प्रकार से एक ज्ञानात्मक प्रक्रिया है

◆ चिंतन एक मानसिक खोज है

◆ चिंतन किसी लक्ष्य या उद्देश्य की ओर अग्रसर होता है

◆ चिंतन समस्या समाधान संबंधी व्यवहार है

◆ चिंतन एक आंतरिक प्रक्रिया है

◆ चिंतन के समय बाहरी गत्यात्मक क्रियाएं बंद हो जाती है


चिंतन के प्रकार 

प्रत्यक्ष चिंतन-  प्रत्यक्ष बोध या प्रत्यक्षीकरण इस चिंतन का आधार है 

अमूर्त चिंतन  - उददीपक की अनुपस्थिति में किया गया चिंतन 

तार्किक चिंतन - यह उच्च स्तर का चिंतन है इसमें समस्या का समाधान किया जाता है

★ जिम्बार्डो व रुक ने चिंतन के दो प्रकार बताए हैं 

1 स्वली चिंतन - इसमें व्यक्ति अपने काल्पनिक विचारों की अभिव्यक्ति करता है इसमें किसी समस्या का समाधान नहीं होता 

उदाहरण - स्वपन, अभिलाषा  

2 यथार्थवादी चिंतन-  इसका संबंध वास्तविकता से होता है इसके सहारे व्यक्ति किसी भी समस्या का समाधान कर लेता है 

यथार्थवादी चिंतन को तीन भागों में बांटा गया है

1अभिसारी चिंतन/निगमनात्मक चिंतन - इस चिंतन में व्यक्ति दिए गए तथ्यों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की कोशिश करता है

2 अपसारी चिंतन/आगमनात्मक चिंतन/सृजनात्मक चिंतन - इसमें व्यक्ति दिए गए तथ्यों में अपनी ओर से कुछ नया पत्थर जोड़ कर एक निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचता है

3 आलोचनात्मक चिंतन- इस चिंतन में व्यक्ति किसी वस्तु तथ्य आदि के सारे गुण दोषों को परख लेने के पश्चात ही निष्कर्ष पर पहुंचता है

चिंतन का विकास 

◆ चिंतन का विकास भाषा विकास के कुछ समय बाद प्रारंभ हो जाता है 

◆ बालक में सर्वप्रथम प्रत्यक्ष-आत्मक चिंतन का विकास प्रारंभ होता है वह अपने चारों ओर मूर्त वस्तुओं के संबंध में चिंतन प्रारंभ करता है 

■ पियाजे का  विचार है कि 7 वर्ष तक बालक की प्रवृत्ति आत्मकेंद्रित होने के कारण स्वयं के संबंध में ही अधिक चिंतन करता है 

★ इसके पश्चात कल्पनात्मक चिंतन तथा उसके बाद प्रत्ययात्मक चिंतन प्रारंभ हो जाता है 

■ आयु बढ़ने के साथ-साथ चिंतन में तर्क की प्रधानता बढ़ती जाती है और तार्किक चिंतन का विकास हो जाता है 

चिंतन की विशेषता 

★ चिंतन में मानसिक प्रक्रिया निहित है 

★ चिंतन के लिए किसी प्रकार की समस्या का होना आवश्यक है 

★ चिंतन स्थूल से सूक्ष्म की ओर चलता है 

★ चिंतन में विश्लेषण में संश्लेषण की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है 

★ चिंतन को रुचि, अभिप्रेरणा, संप्रत्यय, वातावरण, भाषा, व्यक्तित्व आदि प्रभावित करते हैं


समस्या समाधान - समस्या समाधान उपागम हंट द्वारा दिया गया, यह उच्च स्तरीय उपागम माना जाता है इसमें सृजनात्मक चिंतन निहित रहता है 

★ जब व्यक्ति के सामने समस्या उपस्थित होती है तो समस्या चिंतन को जन्म देती है तथा चिंतन के द्वारा व्यक्ति समस्या का समाधान खोजता है 

★ समस्या समाधान एक वैज्ञानिक विधि है 

■ बेरॉन के अनुसार- समस्या समाधान एक संज्ञानात्मक प्रक्रिया है इसमें विभिन्न अनुक्रियाओं को करने या उनमें से चुनने का प्रयास सम्मिलित रहता है ताकि वांछित लक्ष्य की प्राप्ति हो सके 

समस्या समाधान के चरण 

1 समस्या की पहचान करना 

2 रूपरेखा तैयार करना 

3 आंकड़ों का संकलन करना 

4 उपकल्पनाओं का निर्माण करना 

5 आंकड़ों का विश्लेषण करना 

6 निष्कर्ष निकालना

 समस्या समाधान की विधियां

यादृच्छिक अन्वेषण विधि - इस विधि में व्यक्ति समाधान के लिए प्रयत्न व त्रुटियों का सहारा लेता है 

स्वतः शोध अन्वेषण विधि - इस विधि में व्यक्ति समस्या समाधान के लिए उन्हीं विकल्पों का चयन करता है जो उसे संगत प्रतीत होते हैं 

मेटलिन के अनुसार - समस्या समाधान के तीन महत्वपूर्ण पहलू है

 1 मौलिक अवस्था - समस्या की अवस्था

 2  लक्ष्य अवस्था - समाधान की अवस्था 

 3 नियम  - समस्या समाधान के बीच में किए गए कार्य जिसके माध्यम से लक्ष्य तक पहुंचा गया हो



प्रत्यक्षण - वुडवर्थ के अनुसार - प्रत्यक्षण ज्ञानेंद्रियों द्वारा वस्तुओं एंव वस्तुनिष्ठ तथ्यों को जानने की प्रक्रिया है


संवेदना - ज्ञानेंद्रियों के प्रभाव से मस्तिष्क तक पहुंचने की प्रक्रिया को संवेदना कहते हैं संवेदना मस्तिष्क की एक सामान्य व सरलतम प्रक्रिया है

★  ज्ञानेंद्रियों के आधार पर पांच प्रकार की संवेदना होती है परंतुुुु आधुनिक मनोवैज्ञानिको नेे सात संवेदनाओं ( आंख, कान, नाक, त्वचा, जिह्वा, दिशा संवेदना, संतुलन संवेदना ) के अस्तित्व को स्वीकार किया है

आत्म संप्रत्यय - व्यक्ति स्वयं के बारे में स्वयं की योग्यताओं, क्षमताओं, भावनाओं आदि के बारे में जो विचार रखता है वह उसके आत्म संप्रत्यय का निर्माण करते हैं 

उदाहरण यदि कोई विद्यार्थी गणित में कमजोर है परंतु संगीत में निपुण है तो उसका स्व संप्रत्यय संगीत में गणित की तुलना में अच्छा व सकारात्मक होता है 

एक नवजात में स्वयं के बारे में धारणा विकसित नहीं होती है 

संप्रत्यय - संप्रत्यय पूर्व अनुभवों पर आधारित होता है, यह प्रत्येक देखी गई वस्तु का व्यक्ति के मन में नमूना या प्रतिमान होता है 

संप्रत्यय का निर्माण 

1 प्रत्यक्षीकरण 

2 गुणों का विश्लेषण 

3 तुलना

4 पृथक्करण

5 सामान्य करण

6 समस्या समाधान


स्मृति - स्मृति पर सर्वप्रथम क्रमबद्ध अध्ययन जर्मन  मनोवैज्ञानिक ऐविंगहास द्वारा 1885 में किया गया

 वुडवर्थ के अनुसार - सीखने के पश्चात उस बात को याद रखना या पुनः प्रस्तुत करना स्मृति कलहाती है 

 ■ स्मृति के तीन प्रमुख तत्व है 

1 कूट संकेतन 

2 भंडारण 

3 पुनरुद्धार 

■ एटकिंसन ने 1968 में स्मृति का प्रथम मॉडल "अवस्था मॉडल" प्रस्तुत किया 

★ अवस्था मॉडल के अनुसार स्मृति तीन प्रकार की होती है

तात्कालिक स्मृति - इसमें व्यक्ति सूचनाओं को एक सेकंड या उससे भी कम समय के लिए याद रख पाता है 

अल्पकालिक स्मृति-  इसमें स्मृति का स्थाईपन 20 - 30 सेकंड तक होता है

★  विलियम जेम्स ने इसे प्राथमिक समृति का है

3  दीर्घकालीन स्मृति - इसे विलियम जेम्स ने गौण स्मृति कहा है,  इसमें व्यक्ति कम से कम 30 सेकंड तथा अधिक से अधिक कितने भी दिनों तक याद रख सकता है



 मानचित्र निरूपण - मानचित्र निरूपण एक ऐसा चित्र या नक्शा होता है जो विभिन्न अवधारणाओं के बीच संबंध को दर्शाता है यह एक आलेखीय उपकरण होता है जो किसी विषय के अलग-अलग पहलुओं को व्यवस्थित रूप देता है

■ अवधारणा मानचित्र के लाभ

1 पाठ को पढ़ाने से पूर्व योजना निर्माण में सहायक 

2 व्याख्यान का सारांश हेतु सहायक 

3 जटिल सरंचनाओ की रूपरेखा में सहायक

4 पूर्व अवधारणा के साथ नवीन अवधारणा को जोड़कर समझने में सहायक

कल्पना - पूर्व अनुभवों के आधार पर किसी वस्तु की अनुपस्थिति में भी उस वस्तु के बारे में सोचना कल्पना है 

मेकडुगल के अनुसार - कल्पना मानसिक हस्त व्यापार है तथा अप्रत्यक्ष वस्तु के बारे में चिंतन है 


 ■ मेकडुगल के अनुसार कल्पना के प्रकार

उत्पादन कल्पना -  पूर्व अनुभवों के आधार पर नव निर्माण 

पुनरुत्पादन कल्पना - एक बार नव निर्माण के बाद भी नवीन विचारों का सृजन होना 

■ कल्पना की विशेषता 

◆ मानसिक प्रक्रिया 

◆ पूर्व अनुभवों पर आधारित 

◆ प्रतिभा चयन 

◆ सृजन शक्ति

◆ उत्पादन विचार 

◆ मौलिक चिंतन का आधार

 

कल्पना के लाभ 

● बालक को चिंतनशील बनाती है 

● बालकों को निष्कर्षों तक ले जाती है 

● बालक में सृजनशीलता के गुणों का विकास करती है



तर्क = किसी भी समस्या के समाधान हेतु किया गया वह चिंतन जिसके द्वारा निश्चित रूप से समाधान हो ही जाता है ऐसे वास्तविक चिंतन को तर्क कहते हैं 


■ चिंतन को क्रमबद्ध करने की प्रक्रिया तर्क है 

■ तर्क को चिंतन का सर्वोच्च स्तर भी कहते हैं 

★ तर्क वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से व्यक्ति किसी वस्तु घटना के संदर्भ में तर्क - वितर्क करते हुए किसी परिणाम तक पहुंचता है 

गैरेट के अनुसार - मन में किसी उद्देश्य को रखकर किया गया क्रमबद्ध चिंतन ही तर्क कहलाता है 

गेट्स के अनुसार -  तर्क एक निश्चित फलदाई चिंतन की प्रक्रिया है 

जेम्स ड्रेवर के अनुसार - तर्क वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से किसी निश्चित निष्कर्ष तक पहुंचने का कार्य किया जाता है 

स्किनर के अनुसार - तर्क शब्द का प्रयोग कारण व उसके प्रभावों की मानसिक पहचान करने के लिए किया जाता है 

तर्क के प्रकार 

निगमनात्मक तर्कपूर्व में ज्ञात नियमों के आधार पर किसी निश्चित निष्कर्ष तक पहुंचने की प्रक्रिया निगमनात्मक तर्क कहलाती है 

नोट - निगमनात्मक तर्क मानव व पशु दोनों में होता है 

आगमनात्मक तर्क -  दिए गए तथ्यों में अपनी और नवीन तथ्य जोड़कर किसी निष्कर्ष तक पहुंचने की प्रक्रिया आगमनात्मक तर्क कहलाती है 

आगमनात्मक तर्क का सृजनात्मक चिंतन से गहरा संबंध होता है 
आलोचनात्मक तर्क - किसी वस्तु को ज्यों का त्यों स्वीकार करने से पूर्व उसके गुण व दोषों को स्वीकार कर, परख कर उसे मान लिया जाए या किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाए तो वहां आलोचनात्मक तर्क कहलाता है 

सादृश्यवादी तर्क -  जब किसी उपमा के आधार पर तर्क वितर्क करके किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाता है तो उसे सादृशयवादी तर्क कहते हैं 
उदाहरण-  महाराणा प्रताप वीर योद्धा थे उनकी भांति ही लक्ष्मीबाई वीरांगना थी

तर्क के सोपान
1 समस्या पहचान करना 
2 समस्या को जानना 
3 उपाय खोजना
4 एक उपाय का चयन करना 
5 उपाय का उपयोग करना 
6 निर्णय करना













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