संपूर्ण बाल विकास unit 1

 बाल विकास का इतिहास 


◆ 1628 ईस्वी में यूरोपीय विद्वान कोमेनियस ने बाल शिक्षा को लेकर school of infency नामक शिशु पाठशाला की शुरुआत की 

 18 वीं शताब्दी में जर्मनी के विद्वान पेस्टोलॉजी ने 1774 ईस्वी में अपने 3 वर्ष के पुत्र के विकास को ध्यान में रखते हुए बेबी-बायोग्राफी नामक पुस्तक की रचना की

●  इसका प्रभाव जर्मनी के बच्चों के डॉक्टर टाइडमेन पर पड़ा जिन्होंने चिकित्सा के क्षेत्र में बालक के विकास  में गति प्रदान की 

◆19वीं सदी में श्रीमती विक्टोरिया हरलॉक ने पहली बार कहा कि एक बालक का विकास गर्भावस्था से प्रारंभ होता है और उसके विचारों से बाल मनोविज्ञान, बाल विकास बना 

★ अमेरिकी विद्वान स्टेनली हॉल ने 1893 में बाल विकास आंदोलन शुरू किया, इन्होंने चाइल्ड स्टडी सोसाइटी व चाइल्ड वेलफेयर ऑर्गेनाइजेशन की स्थापना की

■ बाल विकास आंदोलन के जनक स्टेनली हॉल को माना जाता है

■ न्यूयॉर्क में 1887 में सबसे पहले बाल सुधार गृह स्थापित किया गया 

★ भारत में बाल विकास के अध्ययन की शुरुआत 1930 ई. से मानी जाती है (ताराबाई मोडक ने की)

■ यूनानी दार्शनिक प्लेटो ने अपनी पुस्तक रिपब्लिक में लिखा कि बाल्यावस्था के प्रशिक्षणो का प्रभाव बालक की बाद की व्यवसायिक कुशलता पर पड़ता है
 
■ जॉन लॉक के अनुसार - बालक का मस्तिष्क कोरी स्लेट के  समान होता है में उस पर कुछ भी लिख सकता हूं 

★ 18 वीं शताब्दी में रूसो ने  अपनी पुस्तक  EMILE में बाल केंद्रित शिक्षा का सर्वप्रथम विचार प्रकट किया

■ रूसो  के अनुसार - बालक एक पुस्तक के समान है अतः सभी अध्यापकों को उस पुस्तक का अध्ययन करना चाहिए 

◆ प्रथम बाल निर्देशन की स्थापना विलियम हिली ने शिकागो में 1909 में की 

★ बाल विकास का सर्वप्रथम अध्ययन जॉन लॉक, हॉब्स ने किया 

■ बाल विकास का  वैज्ञानिक अध्ययन सर्वप्रथम 
पेस्टोलॉजी ने किया इसलिए पेस्टोलॉजी को बाल मनोविज्ञान का जनक माना जाता है 

◆ वर्तमान में बाल मनोविज्ञान को बाल विकास के नाम से जाना जाता है 

◆ मारिया मोंटेसरी के अनुसार - बालक में सच्ची शक्ति का निवास होता है उसकी मुस्कुराहट ही प्रेम व उल्लास की आधारशिला है 

◆ फ्रोबेल के अनुसार - बालक स्वयं विकासोन्मुख होने वाला पौधा है

बाल विकास के आधार-

1 वंशक्रम 

2 वातावरण

 ■  वुडवर्थ के अनुसार -  बाल विकास वंशक्रम व वातावरण का  गुणनफल है योगफल नहीं

वंशक्रम

•  वंशक्रम = पूर्वजो से प्राप्त वह लक्षण जिस से संतानोत्पत्ति का निर्धारण होता है या अपने समान संतान उतपन्न करने की प्रकिया ही वंशक्रम कहलाती है

★ पूर्वजो से प्राप्त गुणों व विशेषताओ का पीढ़ी दर पीढ़ी संतानों में स्थानातरण होने की प्रक्रिया वंशक्रम कहलाती है

 ★ वैज्ञानिक दृष्टिकोण से - जीन्स के माध्यम से माता- पिता के गुणों का संतानों में हस्तातंरण होना ही आनुवांशिकता या वंशक्रम है

■ शरीर का आरंभ केवल एक कोष से होता है जिसे संयुक्त कोष कहा जाता है जो मातृ + पितृ कोष से मिलकर बनता है


परिभाषा

◆  पीटरसन के अनुसार- माता पिता के माध्यम दादा- दादी नाना- नानी एंव पूर्वजों के लक्षणो का संतानों में हस्तातंरण ही     वंशक्रम  है

 ◆ जेम्स ड्रेवर के अनुसार- माता पिता के शारीरिक एंव मानसिक विशेषताओ का संतानों में हस्तातंरण होना ही वंशक्रम है

◆ B N झा के अनुसार-  बालक बालिकाओ की जन्मजात शक्तियों का पूर्ण योग ही वंशक्रम है

★ वंशक्रम के सिद्धान्त

■ बीजकोष की निरन्तता का सिद्धांतप्रतिपादक-  बीजमैंन 
◆ मानव शरीर में दो प्रकार के कोष होते हैं- 1. दैहिक कोष 2.उत्पादक कोष

● दैहिक कोष शारीरिक संरचना का कार्य तथा उत्पादक कोष गुणों का हस्तातंरण का कार्य करते है

◆ बीजमेन के अनुसार जिस जीव- द्रव्य से सजीवों की उत्पति   होती है वह द्रव्य कभी समाप्त नही होता, वह पीढ़ी दर पीढ़ी संतानों हस्तातंरित होता रहता है

■ अर्जित गुणों के स्थानातरण का सिद्धांत :- प्रतिपादक - लेमार्क 

 इस नियम के अनुसार माता-पिता द्वारा अपने जीवन काल में अर्जित किए जाने वाले गुण उनकी संतान को प्राप्त होते हैं क्योंकि इन गुणों का प्रभाव जनन द्रव्य पर होता है|

लेमार्क ने जिराफ की गर्दन का उदाहरण दिया

■ प्रत्यागमन/ परावर्तन का नियम:- 

      इस नियम के अनुसार,” बालक में अपने माता पिता के ठीक विपरीत गुण पाए जाते हैं |  बहुत प्रतिभाशाली माता-पिता के बच्चों में मंदबुद्धि होने और मंदबुद्धि माता-पिता के बच्चो का प्रतिभाशाली होना ही प्रत्यागमन का नियम है  

Example - बाबर का पुत्र हुमायूं


■ अर्जित गुणों के अस्थानातरण का सिद्धांत

      प्रतिपादक- बीजमैंन

बिजमेंन के अनुसार वातावरण से अर्जित गुणो को वंशक्रम के माध्यम से  संतानो में स्थानातरण नहीं किया जा सकता है

Note-  बिजमेंन ने चूहे की पूंछ को काटकर यह प्रयोग किया

■ समानता का नियम 

     इस नियम के अनुसार माता – पिता जैसे होते है उनकी संतान भी वैसी ही होगी यदि माता -पिता बुद्धिमान है तो उनकी संतान भी बुद्धिमान होगी और यदि माता – पिता कद में छोटे होगे तो उन की संतान भी छोटे कद की होगी  

NOTE -इस नियम को परखने के बाद यह पाता लगा कि इस नियम का सामान्यीकरण (Generalization) नहीं कर सकते, क्योकि कभी कभी यह भी देखा गया है। सुन्दर माता पिता के बच्चे सुन्दर नही होते, तथा कुरूप माता – पिता के बच्चे सुन्दर पैदा होते हैै

 वंशक्रम के प्रभावो का अध्ययन

1- ज्यूक वंश पर अध्ययन-   

  डगलस के अनुसार-  चरित्रहीन माता पिता की संतानें   चरित्रहीन  होती है

2- एडवर्ड वंश पर अध्ययन-

   विनशिप के अनुसार प्रतिष्ठित माता पिता की संतानें प्रतिष्ठा प्राप्त करती है

3 कालिकाक वंश पर अध्यन- 

प्रतिपादक-  गोडार्ड

कालिकाक एक भ्र्ष्ट सिपाही था और पत्नी मंद बुद्धि थी, उनकी अधिकांश संताने  मंदबुद्धि, अवैध, थी

कालिकाक की दूसरी पत्नी एक विदुषी महिला थी उनकी अधिकांश संताने प्रतिष्टित व उच्च पदों पर कार्यरत थी

4 थोर्नडाइक के अनुसार - बालक की मूल शक्तियां उसके वंशकर्म पर निर्धारित है थोर्नडाइक ने जुड़वा बच्चों की समानता जानने के लिए उनका अध्ययन 6 प्रकार की मानसिक परीक्षाओं के आधार पर किया

5 शारीरिक लक्षणों का प्रभाव-  पीएरसन के अनुसार यदि माता-पिता की लंबाई अधिक है तो बालकों की लंबाई भी अधिक होगी और माता-पिता की लंबाई कम होती है तो बालकों की लंबाई भी कम होगी

6  बुद्धि पर प्रभाव - गोड़ार्ड का मत है तीव्र बुद्धि माता पिता की संतान तीव्र बुद्धि तथा मंदबुद्धि माता-पिता की संतान मंदबुद्धि होगी

वातावरण -

इसके लिए पर्यावरण शब्द का भी प्रयोग किया जाता है।पर्यावरण दो शब्दों से बना है― परि + आवरण, परि का अर्थ है ― चारों ओर तथा आवरण का अर्थ― ढका हुआ।

● इस प्रकार पर्यावरण या वातावरण वह वस्तु है जो हमें चारों से ढके हुए  है   

◆वायुमंडल में उपस्थित भौतिक एवं अभौतिक तत्वो का वह संगठन जो मानव जीवन पर प्रत्यक्ष/ अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव डालता हो वातावरण कहलाता है

★जहाँ वंशक्रम प्रभाव डालता है वहाँ वातावरण भी प्रभाव डालता है

परिभाषा

वुडवर्थ के अनुसार - वातावरण में वे सब बाह्य तत्व आ जाते हैं जिन्होंने व्यक्ति को जीवन आरंभ करने से लेकर वृद्धावस्था तक प्रभावित किया है।”

रॉस के अनुसार - वातावरण वह बाहरी शक्ति है जो हमें प्रभावित करती है

जिस्बर्ट के अनुसार - वातावरण वह हर वस्तु है जो किसी अन्य वस्तु को घेरे हुए है और सीधे उस पर अपना प्रभाव डालती है।”


वातावरण के कारक 

(1)भौतिक कारक - मनुष्य के विकास पर जलवायु का प्रभाव पड़ता है। जहां अधिक सर्दी पड़ती है या जहां अधिक गर्मी पड़ती वहाँ मनुष्य का विकास एक जैसा नहीं होता है,ठंडे प्रदेशों के व्यक्ति सुंदर, गोरे, स्वस्थ और बुद्धिमान तथा अधिक धैर्यवान होते है,जबकि गर्म प्रदेश के व्यक्ति काले,चिड़चिड़े तथा आक्रामक स्वभाव के होते हैं।

(2) आर्थिक कारक- धन से केवल सुविधाएं नहीं प्राप्त होती हैं,बल्कि इससे पौष्टिक चीजें भी खरीदी जा सकती हैं। जिससे मनुष्य का शरीर विकसित होता है,आर्थिक वातावरण मनुष्य की बौद्धिक क्षमता को भी प्रभावित करता है सामाजिक विकास पर भी इसका प्रभाव पड़ता है।

(3) सामाजिक कारक - व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी है इसलिए उस पर समाज का प्रभाव अधिक दिखाई देता है,सामाजिक व्यवस्था, रहन-सहन ,परंपराएं, धार्मिक रीति- रिवाज, पारस्परिक अन्तः क्रिया,और संबंध आदि बहुत से तत्व है,जो मनुष्य के शारीरिक मानसिक तथा भावात्मक एवं बौद्धिक विकास को किसी न किसी ढंग से अवश्य प्रभावित करते हैं।

(4) सांस्कृतिक कारक - धर्म और संस्कृति मनुष्य के विकास को अत्यधिक प्रभावित करती है,खाने का ढंग,रहन-सहन का ढंग, पूजा पाठ का ढंग, समारोह मनाने का ढंग, संस्कार का ढंग आदि हमारी संस्कृति है।

बालक पर वातावरण का प्रभाव-

1 शारीरिक अंतर पर प्रभाव

    फ्रेंज बोन्स के अनुसार-“विभिन्न प्रजातियों के अंतर  का कारण वंशानुक्रम ना होकर वातावरण है।” 

2  मानसिक विकास का प्रभाव –

गार्डन के अनुसार-“उचित सामाजिक व सांस्कृतिक वातावरण ना मिलने पर मानसिक विकास की गति मंद पड़ जाती है।”

3 प्रजाति की श्रेष्ठता का प्रभाव-

क्लार्क के अनुसार-“कुछ प्रजातियों की बौद्धिक श्रेष्ठता का कारण वंशानुक्रम ना होकर वातावरण है।” 

4 बुद्धि पर प्रभाव-

कैंडोल के अनुसार-“बुद्धि के विकास में वंशानुक्रम की अपेक्षा वातावरण का प्रभाव कहीं अधिक पड़ता है।”

5 व्यक्तित्व पर प्रभाव-

कूले के अनुसार-“व्यक्तित्व के निर्माण में वंशानुक्रम की अपेक्षा वातावरण का अधिक प्रभाव पड़ता है।”

■ वुडवर्थ के अनुसार - व्यक्ति वंशानुक्रम अथवा  वातावरण का योग नहीं गुणनफल है

■ क्रो एंड क्रो के अनुसार-व्यक्ति का निर्माण न केवल वंशानुक्रम और ना केवल वातावरण से होता है।वास्तव में यह जैविकदाय और सामाजिकरण के विरासत के एकाकीकरण की उपज है


वंशक्रम और वातावरण में संबंध 


1  वंशक्रम और वातावरण को अलग नहीं किया जा सकता,  बालक के पूर्ण और संतुलित विकास के लिए दोनों ही अनिवार्य है
2 बालक के विकास के लिए वंशानुक्रम और वातावरण का समान महत्व है वंशानुक्रम जितना समृद्ध होगा व्यक्तित्व का उतना अधिक विकास होगा

3 वंशानुक्रम और वातावरण परस्पर एक दूसरे पर निर्भर है क्योंकि बालक की जो मूल प्रवृत्तियां वंशानुक्रम से प्रभावित होती है उसका विकास वातावरण में होता है

4 विकास तथा वातावरण के प्रभावों में अंतर करना असंभव है क्योंकि व्यक्ति के जीवन और विकास पर प्रभाव डालने वाली प्रत्येक वस्तु वंशानुक्रम और वातावरण के क्षेत्र में आ जाती है


अभिवृद्धि-

बालको की शारीरिक सरंचना में होने वाला बाह्य परिवर्तन जिसका मापन संभव हो अभिवृद्धि कहलाती है,जैसे-  ऊंचाई , चौड़ाई, आकर का बढ़ना

■ अभिवृद्धि की निश्चित दिशा व क्रम होता है

■ अभिवृद्धि पर वंशक्रम का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है

■ अभिवृद्धि गर्भावस्था से प्रारंभ होकर  किशोरावस्था तक चलती है

■ अभिवृद्धि का सकुंचित क्षेत्र होता हैं

■ अभिवृद्धि एक मात्रात्मक प्रकिया है

■  अभिवृद्धि का मापन संभव है

■ अभिवृद्धि का स्वरूप बाह्य होता है

■ अभिवृद्धि एक निश्चित आयु के बाद रुक जाती है

■ अभिवृद्धि का संबंध शारीरिक और मानसिक परिपक्वता से है 
■ अभिवृद्धि में व्यक्तिगत विभेद होते है अथार्थ प्रत्येक व्यक्ति में अभिवृद्धि समान नही होती

अभिवृद्धि की परिभाषा

■  जॉन डीवी के अनुसार- अभिवृद्धि स्वंय होती है  उसे लादा नही जा सकता

■  फ्रेंक के अनुसार- कोशिकीय गुणात्मक वृद्वि ही         अभिवृद्धि है

■  हरलॉक के अनुसार- लंबाई , वजन , आकार, में वृद्धि अभिवृद्धि है, परन्तु इसका संगठित रूप विकास है

■ सोरेंसन के अनुसार- बालको की शारीरिक सरंचना में होने वाला बाह्य परिवर्तन जिसका मापन संभव हो अभिवृद्धि है

■ मेरिडिथ के अनुसार- “कुछ लेखक अभिवृद्धि का प्रयोग केवल आकार की वृद्धि के अर्थ में करते हैं और विकास का प्रयोग विभेद या विशिष्टीकरण के रूप में करते हैं।


विकास =

बालको की शारीरिक संरचना मै होने वाले बाह्य ओर आंतरिक परिवर्तन जिसका मापन संभव न हो विकास कहलाता है

विकास की परिभाषा =

★ जॉन डीवी-  शरीर के किसी अंग में होने वाला परिवर्तन अभिवृद्धि है, परन्तु समय के प्रभाव से होने वाला परिवर्तन विकास है

★ हरलॉक- विकास मे बालक नवीन विशेषताये  ओर योग्यतायें प्रकट करता है

★ जेम्स ड्रेवर- विकास एक परिवर्तनशील प्रक्रिया है, जिसमे बालक नवीन क्षमताएं अर्जित करता है

★ मुनरो- विकास बालको को गर्वावस्था से परिपक्वता की ओर अग्रसर करने वाली प्रक्रिया है

★ब्रूनर के अनुसार - विकास की किसी भी अवस्था में बालक को कुछ भी सिखाया जा सकता है 

★ बर्क के अनुसार - बाल विकास मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसके अंतर्गत गर्भावस्था से लेकर किशोरावस्था तक होने वाले विकास का अध्ययन किया जाता है

 ★ गैसल के अनुसार - विकास एक तरह का परिवर्तन है जिसके द्वारा बालक में नवीन योग्यता एवं विशेषताओं का विकास होता है 

■ हरलॉक के अनुसार विकास में  4 प्रकार के  परिवर्तन होते है-
1  आकार में परिवर्तन
2 अनुपात में परिवर्तन
3  पुराने चिन्हों का लोप 
4  नए कि चिन्हों का उदय

विकास के नियम/ सिद्धान्त

1- निरन्तता का सिदान्त- 

इस नियम के अनुसार विकास एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है जो बिना रुके लगातार चलती रहती है, जबकि अभिवृद्धि एक निश्चित समय पर आकर रुक जाती है

2 - समानता का नियम- 

इस नियम के अनुसार प्रत्येक सजीव अपने सामान ही जीव उतपन्न करता है, ओर सभी मे विकास की प्रक्रिया समान रूप से होती है

3-  परस्पर संबंध का नियम- 

इस नियम के अनुसार प्रत्येक विकास परस्पर एक दूसरे से अतः संबंधित है, इन्हें एक दूसरे से अलग नही किया जा सकता
जैसे- भाषाई विकास-मानसिक विकास से  ओर गत्यात्मक विकास-शारीरिक विकास से संबंधित है

4-  दिशा का नियम- 

इस नियम के अनुसार विकास की दिशा सिर से पैर की तरफ तथा केंद्र से परिधि या अंदर से बाहर की तरफ होता है
● मस्तकबोधमुखी विकास- सिर से पैर की तरफ
● निकट दूर क्रम विकास- अंदर से बाहर की तरफ

5- वर्तुलाकार गति का नियम-

इस नियम के अनुसार विकास की गति लम्बवत ना होकर सर्पिलाकार होती है, विकास केवल लंबाई में न होकर  अथार्थ रेखीय ना होकर चारों ओर होता है

6 - मस्तबोध का नियम- 

 गर्वावस्था में शरीर निर्माण के क्रम को मस्बोध कहा जाता है, इस नियम के अनुसार गर्वावस्था में सर्वप्रथम सिर- मुँह- गर्दन-धड़-पैर का निर्माण होता है

7-  विकास पूर्वानुमेय होता है, 

8-  विकास की भविष्यवाणी संभव है- 

  समान परिस्थितियों और अनुकूल बातावरण के आधार पर विकास की भविष्यवाणी संभव है

9- केंद्रीकरण का नियम-  

इस नियम के अनुसार  बालक सर्वप्रथम शरीर के सम्पूर्ण अंग का प्रयोग करता है उसके बाद अन्य छोटे अंगों का प्रयोग करता है

10- सामान्य से विशिष्टता का नियम-

  इस नियम के अनुसार बालक सर्वप्रथम सामान्य क्रिया करता है उसके बाद विशिष्ट क्रिया करता है

11- व्यक्तिगत भिन्नता का नियम- 

इस नियम के अनुसार प्रत्येक सजीव में विकास की दर अलग अलग होती है, प्रतिभाशाली बालक का तीव्र गति से सामान्य बालक का  सामान्य गति से और मंदबुद्धि बालक का विकास मंद गति से होता है

12 अन्तः क्रिया का नियम 

पहले बालक की तुलना दूसरा बालक तीव्र गति से सीखता है ( देखकर, सुनकर व अनुकरण से सीखना)

13 विकास की प्रत्येक अवस्था के अपने खतरे हैं

14  विकास की प्रारंभिक अवस्था बाद की अवस्था से अधिक महत्वपूर्ण है

★ अभिवृद्धि और विकास में अंतर



 अभिवृद्धि       विकास
अभिवृद्धि का
स्वरूप बाह्य होता है।
जबकि विकास आंतरिक ओर बाह्य दोनों होता है।
अभिवृद्धि कुछ समय के बाद रुक जाती है।विकास जीवन पर्यंत चलता रहता है।
अभिवृद्धि का संबंध शारीरिक तथा मानसिक
परिपक्वता से हैं।
जबकि विकास वातावरण से भी संबंधित होता है।
अभिवृद्धि का कोई लक्ष्य नहीं होताविकास का कोई ना कोई लक्ष्य जरुर होता है।
अभिवृद्धि में कोई निश्चित दिशा नहीं होती जबकिविकास की एक निश्चित दिशा होती है।
अभिवृद्धि का प्रयोग संकुचित अर्थ में किया जाता हैविकास का प्रयोग व्यापक अर्थ में किया जाता है।
अभिवृद्धि पर
वातावरण के कारकों के अनुसार प्रभाव
पड़ता है
जबकि इसमें परिपक्वता के विकास का संबंध वृद्धि में ही निहित होता है


विकास की अवस्थाएं 

श्रीमती हरलॉक के अनुसार 

 गर्भावस्था   - गर्भधारण से जन्म तक

शैशवावस्था  - जन्म से 2 सप्ताह तक

बचपनावस्था - 2 सप्ताह से 2 वर्ष तक

पूर्व बाल्यावस्था - 3 से 6 वर्ष तक

उत्तर बाल्यावस्था  - 7 से 14 वर्ष तक

पूर्व किशोरावस्था  - 15 से 17 वर्ष तक

उत्तर किशोरावस्था - 18 से 21 वर्ष तक

प्रौढ़ावस्था -  21 वर्ष के बाद

रॉस के अनुसार 

शैशवावस्था - जन्म से 2 वर्ष

 पूर्व बाल्यावस्था - 3 से 6 वर्ष

 उत्तर बाल्यावस्था - 7 से 12 वर्ष

 किशोरावस्था - 13 से 18 वर्ष

 प्रौढ़ावस्था  - 18 वर्ष के बाद

 जॉन के अनुसार 

शैशवावस्था - जन्म से 6 वर्ष तक

बाल्यावस्था  -7 से 12 वर्ष तक

किशोरावस्था  - 13 से 18 वर्ष

प्रौढ़ावस्था  -18 वर्ष के बाद


शैशवावस्था : 0-2/0-5 वर्ष

★ बाल विकास की महत्वपूर्ण अवस्था
★ बाल विकास की सर्वाधिक दर
★ भावी जीवन की आधारशिला

■ उपनाम :
  ◆ सीखने का आदर्श काल
  ◆ जीवन का महत्वपूर्ण काल
  ◆ भावी जीवन की आधारशिला
  ◆ संस्कारों के निर्माण की अवस्था
  ◆ अतार्किक चिंतन की अवस्था
  ◆ खिलौनों की आयु
  ◆ पराधीनता की अवस्था
  ◆ प्रिय लगने वाली अवस्था
  ◆ पूर्व प्राथमिक विद्यालय की तैयारी की अवस्था
  ◆ खतरनाक अवस्था
  ◆ टोली पूर्व आयु
  ◆ मन की मौजो में विचरण करने की अवस्था
  ◆ सीखने की आयु
  ◆ नाजुक अवस्था
  ◆ घड़ने योग्य आयु

■ महत्वपूर्ण परिभाषाएं:

● एडलर के अनुसार- जन्म के कुछ समय बाद ही यह निश्चित हो जाता है कि भावी जीवन में बालक का क्या स्थान होगा

● गेसल के अनुसार -बालक प्रथम 6 वर्षों में बाद के 12 वर्षों से भी दुगना सीख जाता है

● क्रो एंड क्रो के अनुसार- बीसवीं शताब्दी बालकों की शताब्दी है

● रॉस के अनुसार - शिशु कल्पना का नायक है

● सिगमंड फ्रायड के अनुसार -बालक को जो कुछ भी बना होता है वह चार पांच वर्ष की आयु में बन जाता है
● गुडएनफ के अनुसार- व्यक्ति का जितना भी मानसिक विकास होता है उसका आधा 3 बरस तक हो जाता है

● वैलेंटाइन के अनुसार -
 1 शैशवावस्था सीखने का आदर्श काल है
 2 जीवन का महत्वपूर्ण काल है

शैशवावस्था की विशेषता
★  तीव्र शारीरिक व मानसिक विकास
★ सीखने की तीव्र गति
★  नैतिक गुणों का अभाव
★ सीमित मात्रा में कल्पना
★ जिज्ञासु प्रवृत्ति
★ अनुकरण द्वारा सीखना
★ सवेंदना द्वारा ज्ञान ग्रहण
★ भाषाई कौशलों का विकास आरंभ
★ बाह्य वातावरण का ज्ञान ना होना
★ दोहराने की प्रवृत्ति
★ संवेगो का प्रदर्शन
★ स्वार्थी व स्वकेंद्रित
★ न तो सामाजिक न हीं है असमाजिक
★ क्षणिक मित्रता
★ मूल प्रवृत्यात्मक व्यवहार
★ अपनी ज्ञानेंद्रियों व शारीरिक क्रियाओं के माध्यम से सीखना

बाल्यावस्था : 

 ★ बाल्यावस्था को जीवन का निर्माणकारी काल कहते हैं क्योंकि इस अवस्था में बालकों की आदतों, रुचियां एवं नवीन व्यवहारों का निर्माण होता है 

★ सामाजिक दृष्टि से भी यह एक महत्वपूर्ण काल है क्योंकि सर्वाधिक सामाजिक विकास इसी अवस्था में होता है

★ वैदिक साहित्य में बाल्यावस्था को ग्रहण एंव धारण की अवस्था कहा गया

परिभाषा

■  सिंपसन /ब्लेयर  के अनुसार - बाल्यावस्था वह दशा है जिसमें बालकों के दृष्टिकोण, मुल्यो, आदतों का विकास होता है

■ कॉल- ब्रुश के अनुसार- बाल्यावस्था जीवन का अनोखा काल है 

■ किलपैट्रिक के अनुसार- बाल्यावस्था प्रतिद्वंधात्मक  समाजीकरण की अवस्था है

■ स्ट्रेंग के अनुसार - एक 10 वर्ष के बालक के द्वारा ऐसा कोई खेल नहीं है जो उसने नहीं खेला हो

■ रॉस के अनुसार - बाल्यावस्था  मिथ्या परिपक्वता का काल है

उपनाम 

● खेल की आयु 
● जीवन का निर्माणकारी काल
● गंदी अवस्था 
● मूर्त चिंतन की अवस्था 
● शैक्षिक काल 
● वस्तु संग्रहण की दशा
● वैचारिक क्रिया की अवस्था
● अनोखा काल
● गेम ऐज
● गैंग ऐज
● उत्पत्ति अवस्था
● प्रतिद्वंधात्मक समाजीकरण का काल

बाल्यावस्था की विशेषताए

★ शारीरिक विकास में स्थिरता आ जाती है
★ मानसिक क्रियाओं की अधिकता हो जाती है
★ सामाजिक गुणों का विकास हो जाता है
★ नैतिक गुणों का विकास हो जाता है
★ बहिर्मुखी व्यक्तित्व
★ हीन भावना का विकास हो जाता है
★ पक्षपात की भावना विकसित हो जाती है
★ समलिंगी प्रेम
★ रचनात्मक प्रवृत्ति का विकास
★ यथार्थवादी दृष्टिकोण
★ निरउद्देश्य भ्रमण की प्रवृत्ति
★ प्रशंसा पाने की इच्छा
★ खोखली मित्रता
★ मूर्त चिंतन की योग्यता 
★समलिंगी समूह भावना 
★नेता बनने की इच्छा 
★भाषा का विकास न करने की प्रवृत्ति 
★खेलों में रुचि
★ संग्रह करने की प्रवृत्ति 
★चोरी करना और झूठ बोलना


किशोरावस्था= किशोरावस्था अंग्रेजी के Adolscence का हिंदी रूपांतरण है जिसका अर्थ परिपक्वता है

● परिपक्वता शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग गैसल द्वारा किया गया

■ किशोरावस्था का क्रमबद्ध व वैज्ञानिक अध्ययन स्टेनली हॉल ने किया

■ इंग्लैंड की हेडो कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार 13 वर्ष की आयु में किशोरों की नसों में एक ज्वार उठता है जिसे किशोरावस्था कहते हैं

★ किलपैट्रिक के अनुसार - किशोरावस्था जीवन का सबसे कठिन काल है

■ रॉस के अनुसार - किशोरावस्था शैशवावस्था का पुनरावृति काल है

★  कॉलसैनिक के अनुसार- किशोर प्रौढ़ वयक्ति को अपने मार्ग की बाधा समझते हैं

■ एरिक्सन के अनुसार- किशोर स्वयं के व्यक्तित्व का स्पष्टीकरण चाहता है

■ स्टैनले हॉल के अनुसार- किशोरावस्था संघर्ष, तनाव व तूफान की अवस्था है

उपनाम

★ जीवन का कठिन काल
★ तार्किक चिंतन की अवस्था 
★गोल्डन एज 
★बसंत ऋतु
★ टीन एज 
★उलझन की अवस्था
★ समस्या समाधान की अवस्था 
★ संक्रमण की अवस्था
★ अवास्तविकताओं की आयु
★ तनाव एवं संघर्ष की अवस्था
★ विशिष्टता की खोज की अवस्था
★ परिवर्तन की अवस्था
★ आंधी तूफान की वस्ता
★ झंझावट की अवस्था

किशोरावस्था की विशेषताएं

● देशभक्ति की भावना का विकास
● नेतृत्व के गुणों का विकास
● समाजिक कार्यों में रुचि 
● पलायन करना 
● विषम लिंगी प्रेम की भावना 
● ईश्वर या धर्म में विश्वास 
● व्यवसाय चयन में समस्या
● समायोजन की समस्या 
● पीढ़ियों में अंतर के कारण विचारों में अंतर
● व्यक्तिगत व घनिष्ठ मित्रता
● कल्पना का बाहुल्य
● दिवा स्वपन की प्रवृत्ति
● समाज सेवा में देशभक्ति की भावना
● विचारों तथा संवेगों में परिपक्वता
● अपने प्रिय के बिछड़ने का गम
● संवेगात्मक परिवर्तन में तीव्रता
● आत्मचेतना की भावना
● अपराध प्रवृति के विकास का नाजुक समय
● स्वतंत्र सोच का विकास
● विषम लिंगी प्रेम की भावना
● समवयस्क समूह भावना
● अध्ययन के प्रति गंभीर
● वित्तीय समस्या
● मादक पदार्थों के सेवन की समस्या
● जीवनसाथी के चुनाव की समस्या
● माता-पिता से अधिक हम उम्र को महत्व देना
● सौंदर्य का उपासक 
● किशोरों की वाणी में भारीपन  
● किशोरियों की वाणी में कोमलता व मधुरता

बाल विकास के आयाम

1 गत्यात्मक विकास-

गत्यात्मक विकास और शारीरिक विकास में गहरा संबंध होता है यह एक दूसरे के पूरक होते हैं
गत्यात्मक विकास की प्रक्रिया :

●  एक माह का बालक अपने सिर को ऊपर उठा लेता है

●  4 माह का बालक सारे के साथ बैठ सकता है

●  6 माह का बालक बिना सारे के बैठ सकता है

●  8 माह का बालक घुटनों के बल चलने लगता हैं

●  10 माह का बालक सारे के साथ खड़ा हो सकता है

● 12 माह का बालक बिना सारे के खड़ा हो सकता है

● 18 माह का बालक चलने लगता है

●  24 माह का बालक दौड़ने लगता है

●  36 माह का बालक अपने स्थान से उछलकर किसी भी दिशा में घूम सकता है

●  5 बरस का बालक अपने वजन का आधा वजन उठा सकता है

● 10 बरस का बालक अपने वजन के बराबर वजन उठा सकता है

● 18 बरस का बालक अपने वजन का दोगुना वजन उठा सकता है


2  मानसिक विकास

मानसिक विकास वह योग्यता है जिसमे व्यक्ति  अपनी समस्याओं  का समाधान कर  वातावरण का शिकार होने से बचता है
■ शैशवावस्था में बालको का सर्वाधिक एंव तीव्र गति से मानसिक विकास होता है

■ पांच वर्ष तक के बालको का 90•/. तक मानसिक विकास पूर्ण हो जाता है

★ गुडएनफ के अनुसार- 

बालको का जितना भी मानसिक विकास होता है उसका आधा प्रारंभिक तीन वर्षों में हो जाता है

★ थार्नडाइक के अनुसार-

तीन से छः वर्ष के बालक प्रायः अर्धस्वपन की अवस्था मे रहते है

मानसिक विकास की प्रक्रिया :

● 1 माह का बालक आवश्यकता पूर्ति के लिए जोर से आवाज करता है

● 2 माह का बालक चमकीली वस्तुओं की ओर आकर्षित होता है

● 3 माह का बालक अपनी माँ को पहचानने लगता है

● 4 माह का बालक अपने नाम को समझने लगता है

● 6 माह का बालक परिचितों को देखकर मुस्कुराता है

● 8 माह का बालक जमीन से अपनी पसंद की वस्तुएं उठाने लगता है

● 10 माह का बालक अपने पास के वातावरण में होने वाले परिवर्तनों को समझने लगता है

●12 माह का बालक अनुकरण करने लग जाता है

● 18 माह का बालक अपनी पसंद की वस्तुओं को संकेतों से मांगने लगता है

● 24 माह का बालक नाम बताना, शरीर के अंगों के नाम बताने लग जाता है

● 36 माह का बालक का बालक 4-5 अक्षरो के शब्द बोलने लगता है

● 5 वर्ष के बालक को सिक्को का ज्ञान हो जाता है

● 6 वर्ष के बालक व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध उच्चारण करने लग जाते है

● 8 वर्ष के बालक अपने जीवन की सामान्य समस्याओ का समाधान करने लग जाता है

● 9 वर्ष के बालक गणित की सरल प्रक्रिया हल कर लेते है

● 12 वर्ष के बालक का भाषाई विकास पूर्ण हो जाता है

●16 वर्ष के बालक का मानसिक विकास पूर्ण हो जाता है


3 सामाजिक विकास :

◆ समाज द्वारा मान्य व्यवहारों को स्वीकार कर अमान्य व्यवहारों को त्यागने की प्रक्रिया ही सामाजिक विकास कहलाती है
★ अपराधिक कार्यों के अतिरिक्त समाज के आदर्शों की पालना ही सामाजिक विकास कहलाता है

शैशवावस्था में सामाजिक विकास :

● इस अवस्था में सामाजिक गुणों का अभाव पाया जाता है

● इस अवस्था में बालकों को सामाजिक संबंधों का ज्ञान नहीं होता

● इस अवस्था में बालकों में नैतिक गुणों का अभाव पाया जाता है

● इस अवस्था में बालक अनुकरण द्वारा सीखने का प्रयास करता है

● बालकों में सर्वप्रथम सामाजिक गुणों की नींव माँ द्वारा रखी जाती है

● इस अवस्था में बालकों को बाह्य वातावरण का ज्ञान नहीं होता

बाल्यावस्था में सामाजिक विकास:

● सामाजिक विकास की यह एक महत्वपूर्ण अवस्था है

● बालकों में सर्वाधिक सामाजिक गुणों का विकास इसी अवस्था में होता है

● इस अवस्था में बालक शिक्षक के सर्वाधिक नजदीक होता है

● इस अवस्था में बालकों में टोली की भावना का विकास हो जाता है

● बालकों में सामाजिक गुणों का विकास सर्वाधिक खेल के मैदान में होता है तथा इस अवस्था में बालकों की खेल में सर्वाधिक रूचि होती है

● इस अवस्था में बालकों को सामाजिक संबंधों का ज्ञान हो जाता है

किशोरावस्था में सामाजिक विकास:

● इस अवस्था में बालकों में समाजिक कार्यों में सर्वाधिक रुचि पाई जाती है

● देश प्रेम की भावना बढ़ जाती है

● ईश्वर व धर्म के प्रति आस्था बढ़ जाती है

● नेतृत्व क्षमता में प्रतियोगी भावना का विकास हो जाता है

● वीर पूजा की भावना का विकास हो जाता है

● उत्तराधिकार की भावना का विकास हो जाता है

◆ इस अवस्था में बालकों को समायोजन की समस्याओं से गुजरना पड़ता है

4 शारीरिक विकास

मेरीडेथ के अनुसार- गर्भावस्था से वृद्धावस्था तक बालक बालिकाओं की शारीरिक संरचना में होने वाले परिवर्तनों की व्यवस्थित श्रंखला शारीरिक विकास कहलाती है
 

शारीरिक विकास की अवस्था :

गर्भावस्था में शारीरिक विकास- 

1 निषेचन - 14 दिन/ 2 सप्ताह

2 डिंबावस्था -14 दिन से 2 सप्ताह 

 ●  शरीर का निर्माण शुरू हो जाता है

3 भ्रूण अवस्था-  3 माह से 9 माह का समय

 ● 3 माह में लिंग का निर्धारण हो जाता है 
 ● तीन माह में भ्रूण के में हृदय की धड़कन प्रारंभ हो जाती है

जन्म के बाद शारीरिक विकास

शैशवावस्था- 0 से 2 वर्ष / 0-5 वर्ष
 
बाल्यावस्था- 6 से 12 वर्ष

किशोरावस्था- 13 से 19 वर्ष

शैशवावस्था में शारीरिक विकास

 ◆नवजात की उम्र - 0-14/ 30 दिन अधिकतम

 ◆नवजात की लंबाई - 19-20 इंच/53cm

 ◆3 माह के बालक की लंबाई-  21 इंच 
 ◆5 वर्ष के बालक की लंबाई 32- 40 इंच/ 101cm

 ◆नवजात का वजन -3 kg/ 7-8 पाउंड
 ◆5 वर्ष के बालक का वजन -15-16kg 

 ◆नवजात के हृदय की धड़कन -140/m
 ◆5 वर्ष के बालक की हृदय की धड़कन- 100/m

 ◆नवजात की श्वसन क्रिया- 45/m
 ◆5 वर्ष के बालक की श्वसन क्रिया- 28/m


बाल्यावस्था में शारीरिक विकास

◆बाल्यावस्था के प्रारंभ व अंत मे लंबाई - 108- 136cm

◆बाल्यावस्था के प्रारंभ में अंत में वजन - 15-16/ 27-28 kg

●बाल्यावस्था के प्रारंभ व अंत में हृदय धड़कन-100-85/m

● बाल्यावस्था के प्रारंभ में अंत में श्वसन क्रिया- 28-18/m
 
◆बाल्यावस्था में सिर का भजन-  950- 1150 ग्राम

◆ बाल्यावस्था में हड्डियों की संख्या- 350 ( सर्वाधिक)

◆ बाल्यावस्था में दांतो की संख्या - 28

किशोरावस्था में शारीरिक विकास

◆किशोरावस्था के प्रारंभ में अंत में लंबाई- 138-165cm

◆किशोरावस्था के प्रारंभ में अंत में भजन- 28-48kg

◆किशोरावस्था में श्वसन क्रिया-14-16/m

◆किशोरावस्था में धड़कन- 72/m

 ◆किशोरावस्था में हड्डियां- 206

 ◆किशोरावस्था में मस्तिष्क का वजन -1360gm

 ◆ शैशवावस्था में लड़कों की लंबाई लड़कियों से अधिक होती है और बाल्यावस्था में लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की लंबाई थोड़ी अधिक होती है तथा किशोरावस्था में पुनः लड़कों की लंबाई अधिक होती है

■ दांतो के विकास की प्रक्रिया गर्भकाल के पांचवे महीने में शुरू हो जाती है जन्म के समय शिशु के दांत नहीं होते सबसे पहले नीचे के 2 दांत निकलते हैं 1 वर्ष तक दांतो की संख्या 8 तथा 4 वर्ष तक दूध के पूरे 20 दांत निकल आते हैं उसके बाद दांतों का गिरना प्रारंभ हो जाता है पांचवें या छठे वर्ष में स्थाई दांत निकलना प्रारंभ हो जाते हैं 12- 13 वर्ष तक दांतो की संख्या 27-28 होती है

5 संवेगात्मक विकास :

■ बालकों की शारीरिक संरचना में तत्काल परिवर्तन कर उन्हें कार्य करने के लिए प्रेरित करने वाली प्रक्रिया संवेग कहलाती है

★संवेग व्यक्ति के जन्म से प्रारंभ होते हैं जो व्यक्ति को गतिशील बनाते हैं 
★संवेग तत्काल उत्पन्न होते हैं परंतु शांत धीरे-धीरे होते हैं

◆ संवेग के माध्यम से रचनात्मक के विनाशात्मक परिणाम प्रकट होते हैं
■ संवेग अंग्रेजी के EMOTION का हिंदी रूपांतरण है जिसका शाब्दिक अर्थ - गति प्रदान करने से होता है

परिभाषा :

★ वुडवर्थ के अनुसार - व्यक्ति के आवेग या गति में आने की दशा ही संवेग है

◆ वैलेंटाइन के अनुसार- जब व्यक्ति में रागात्मक तत्वों का वेग बढ़ता है तो संवेग की उत्पत्ति होती है

■ क्रो एंड क्रो के अनुसार -संवेग को व्यक्ति की उत्तेजित दशा के रूप में व्यक्त किया जा सकता है

 ★ जरशिल्ड के अनुसार - अचानक भड़क उठने या किसी विकार के उत्पन्न होने की प्रक्रिया संवेग कहलाती है

■ बृजेश नामक मनोवैज्ञानिक ने नवजात शिशु में उत्तेजना संवेग बताया

■ वाटसन ने व्यक्ति में तीन प्रकार के संवेग बताएं -

 1 भय 2 क्रोध  3 प्रेम

★  संवेगों की विशेषता

●  संवेग एक चेतन अनुभूति है

●  संवेगों में व्यक्तिगत भिन्नता पाई जाती है

● संवेग व्यक्ति की क्रियाशीलता पर प्रभाव डालते हैं

● संवेग उत्पत्ति के दौरान व्यक्ति की मानसिकता कार्य करना  कम कर देती है

● तत्काल उत्पन्न होते हैं परंतु शांत धीरे-धीरे होते हैं

● संवेग  सुखद वह दुखद होते हैं

● संवेग के रचनात्मक एंव विनाशात्मक परिणाम प्राप्त होते हैं

● संवेग के आंतरिक व बाह्य परिवर्तन होते हैं


विकासात्मक रोग -

आटिज्म(autism)ऑटिज्म एक मस्ती स्वीकार है यह सभी बालकों को अलग-अलग तरीकों से प्रभावित करता है जन्म के कुछ समय पश्चात इसके लक्षण दिखाई देने लगते हैं-
● सामाजिक संपर्क से बचना तथा अकेले रहना
● असामान्य व्यवहार का प्रदर्शन करना
● अपनी भावनाओं को व्यक्त न करना
●  कमजोर संप्रेषण
● आमतौर पर देरी से बोलना
● दूसरों की भावनाओं से अनजान रहना

★ वियोग दुश्चिंता विकार(SAD) -इसमें बालक इस डर से कि कहीं माता-पिता उनसे दूर ना हो जाए किसी भी समाज की गतिविधि में भाग नहीं लेता है और ना ही कहीं अकेले जाना चाहता है हमेशा चिंतित रहता है कि कहीं वह अकेला ना रह जाए कहीं माता-पिता उसे छोड़ कर ना चले जाएं


A.D.H.D.-  इस विकार में बालक ध्यान केंद्रित करने मैं असमर्थ होता है , ध्यान नहीं रखने के कारण स्मरण में भी बाधा आती है, अपनी किताबों, खिलौनों, पेंसिल आदि को रखकर भूल जाता है बालक बिना सोचे समझे जल्दबाजी में कार्य करता है ,स्वभाव में चिड़चिड़ापन पाया जाता है  आक्रामकता का प्रदर्शन करता है  तथा  बेचैनी से अपने शरीर को हिलाता  रहता है


बाल विकास के सिद्धांत



1 मनोसामाजिक विकास सिद्धांत : प्रतिपादक - एरिक इरिक्सन

■ प्रारंभिक दशा में इरिक्सन व फ्रॉयड के सिद्धांत में काफी समानता थी तथा इरिक्सन, सिगमंड फ्रायड के सिद्धांत का समर्थक भी था,
★ इरिकसन का मानना है कि बालक के विकास पर काम-प्रवृत्ति का नहीं बल्कि सामाजिक अनुभूतियों का प्रभाव पड़ता है

★ इरिक्सन  ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘childhood and society, 1963’ में मनोसामाजिक विकास की 8 अवस्थाएं    बताई- 
Trick - विश्वास और स्वतंत्रता के साथ पहल की किंतु अहंकारी बन गए फिर परिश्रम करके पहचान बनाई तो घनिष्ठता मिली और जनन भी संपूर्ण हुुआ

1- विश्वास बना अविश्वास (0-2 वर्ष)

2- स्वतंत्रता बनाम लज्जा   (3 से 4 वर्ष)

3- पहल बनाम दोषिता    (4 से 6 वर्ष)

4- परिश्रम बनाम हीनता  (7 से 12 वर्ष)

5 पहचान बनाम भूमिका भ्रांति (13 से 19 वर्ष)

6 घनिष्ठता बनाना अलगाव  ( 19 से 35 वर्ष)

7 उत्पादकता बनाम निष्क्रियता  (36 से 55 वर्ष)

8 सम्पूर्णता बनाम नैराश्य ( 55 वर्ष के बाद)



एरिक्सन के सिद्धांत के गुण- 

  1. समाज एवं व्यक्ति की भूमिका पर बल- एरिक्सन के व्यक्तित्व सिद्धान्त की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इन्होंने व्यक्तित्व के विकास एवं संगठन को स्वस्थ करने में सामाजिक कारकों एवं स्वयं व्यक्ति की भूमिका को समान रूप से स्वीकार किया हैै
  2. किशोरवस्था को महत्त्वपूर्ण स्थान- एरिकसन  किशोरावस्था व्यक्तित्व के विकास की अत्यन्त संवेदनशील अवस्था होती है। इस दौरान अनेक महत्त्वपूर्ण शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक परिवर्तन होता है
  3. आशावादी दृष्टिकोण -एरिक्सन का मानना है कि प्रत्येक अवस्था में व्यक्ति की कुछ कमियाँ एवं सामथ्र्य होती है। अत: व्यक्ति यदि एक अवस्था में असफल हो गया तो इसका आशय यह नहीं है कि वह दूसरी अवस्था में भी असफल ही होगा, क्योंकि खामियों के साथ-साथ सामथ्र्य भी विद्यमान है, जो प्राणी को निरन्तर आगे बढ़ने के लिये प्रेरित करता है। 
  4. जन्म से लेकर मृत्यु तक की मनोसामाजिक घटनाओं को शामिल करना- एरिक्सन ने अपने सिद्धान्त में व्यक्तित्व के विकास एवं समन्वय की व्याख्या करने में व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक की मनोसामाजिक घटनाओं को शामिल किया है, जो इसे अन्य सिद्धान्तों से अत्यधिक विशिष्ट बना देता है


2 मनोलैंगिक विकास सिद्धांत = प्रतिपादक - सिगमंड फ्रायड 


● सिगमंड फ्रायड बाल विकास का आधार लैंगिक ऊर्जा, कामुकता, लिबिडो को मानते थे परंतु इस बात से उनके शिष्य कार्ल युंग सहमत नहीं थे और उन्होंने विश्लेषणात्मक सिद्धांत का प्रतिपादन किया
 
■ सिगमंड फ्रायड ने मनो लैंगिक विकास की 5 अवस्थाये बताई-

1मुखावस्था-  0 से 1वर्ष

● लैंगिक उर्जा बालक के मुख में होती है 
● बालक प्रत्येक वस्तु को मुख में लेने की कोशिश करता है
ऐसा होने पर वयस्कावस्था में दो प्रकार के व्यक्तित्व विकसित होते हैं-
★ मुखवर्ती निष्क्रिय
★ मुखवर्ती आक्रामक

2=  गुदावस्था- 1 से 3 वर्ष 
●इस अवस्था में लैंगिक उर्जा बालक के गुदीय क्षेत्र में पाई जाती है लैंगिक उर्जा के प्रभाव से बालक आक्रामक, जिद्दी व धारणात्मक प्रवृत्ति का हो जाता है

● इस अवस्था में बालक मल- मूत्र संबंधी क्रियाओं में आनंद लेता है इस अवस्था में लैंगिक संतुष्टि के कम या अधिक होने पर व्यक्ति का व्यवहार अव्यवस्थित  व अति व्यवस्थित हो जाता है

3= लैंगिक अवस्था - 3 से 6 वर्ष 
●इस अवस्था में लैंगिक उर्जा बालकों में केंद्र की ओर अग्रसर होती है , काम परवर्ती लैंगिक क्षेत्र में विद्यमान रहती है
★इनमें इलेक्ट्रा व औडिपस ग्रंथि का विकास हो जाता है, जिसके कारण लड़की अपने पिता से ओर लड़का अपनी माता से अधिक प्रेम करता है

■ इस अवस्था में कम या अधिक लैंगिक संतुष्टि होने पर व्यस्क अवस्था में व्यक्ति योन रोग से ग्रसित हो जाता है

4= अदृश्य अवस्था- 7 से 12 वर्ष
● इस अवस्था में बालकों में लैंगिक ऊर्जा निष्क्रिय हो जाती है इस कारण उसमें  समलैंगिक प्रेम पाया जाता है
★लैंगिक ऊर्जा मार्गान्तरित होकर रचनात्मक कार्यों की ओर अग्रसर हो जाती है

5= जननेंद्रिय अवस्था - 12  वर्ष के बाद 

●  इसमें विषमलिंगी प्रेम की प्रधानता हो जाती है तथा व्यक्ति में लैंगिक परिपक्वता आ जाती है

● सिगमंड फ्रायड के अनुसार इस अवस्था में कामुकता संतानोत्पत्ति की ओर अग्रसर होती है

3 नैतिक विकास का सिद्धांत =प्रतिपादक - लॉरेंस कोहलबर्ग

★ कोहलबर्ग के अनुसार बालकों के नैतिक विकास को समझने से पूर्व बालकों की चिंतन तर्क एवं निर्णय करने की क्षमता को समझना व उसका विश्लेषण करना आवश्यक है क्योंकि उनके नैतिक विकास का आधार तर्क चिंतन और निर्णय क्षमता को ही माना जाता है 

■ कोहलबर्ग ने नैतिक विकास की 6 अवस्थाएं एवं उनके 3   स्तर बताए-

1 प्री कनवेंशनल स्तर - 4 से 10 वर्ष

 इस स्तर में बालकों के तर्क चिंतन एवं निर्णय का आधार बाह्य वातावरण में घटित होने वाली घटनाओं को माना जाता है

(a) आज्ञा व दंड की अवस्था

(b) अहंकार की अवस्था

कन्वेंशनल स्तर- 10 से 13 वर्ष

इस सफर में बालकों के तरफ चिंतन एवं निर्णय का आधार समाजिक घटनाओं को माना जाता है

(C)  उत्तम लड़का लड़की की अवस्था 

(d) सामाजिक परंपराओं के मान्यता की अवस्था

पोस्ट कन्वेंशनल स्तर- 13 वर्ष से ऊपर

इस स्तर में बालक के तरफ चिंतन व निर्णय का आधार उनका स्वयं का विवेक माना जाता है

(e) सामाजिक समझौते की अवस्था

(F)  उच्चतम विवेक की अवस्था

  ■ कोहलबर्ग ने पुनः अपने नैतिक विकास की पांच नवीन             अवस्थाएं बताई -

   1 पूर्व नैतिक विकास की अवस्था  (0-2वर्ष)

   2 स्वकेंद्रित अवस्था (2-7वर्ष)

   3 परंपराओं को धारण करने की अवस्था (7-12वर्ष)

   4 आधारहीन आत्म चेतना की अवस्था (13-18 वर्ष)

   5 आधार युक्त आत्म चेतना की अवस्था (19 के बाद)


4 नैतिक विकास का सिद्धांत =प्रवर्तक - जीन पियाजे

■ जीन पियाजे ने नैतिक विकास का वैज्ञानिक अध्ययन 1928 में प्रारंभ किया पता 1932 में एक पुस्तक मोरल जजमेंट ऑफ़ चाइल्ड प्रकाशित की जीन पियाजे के अनुसार बच्चे जैसे-जैसे वातावरण के साथ अंतः क्रिया करते हैं वैसे-वैसे अपने में परिवर्तन व परिमार्जन लाते हैं और उनका नैतिक विकास होता है

■ जीन पियाजे ने नैतिक विकास सिद्धांत की दो अवस्थाएं बताई-

1 परायत्त नैतिकता की अवस्था- इस अवस्था में बालक अपने से बड़ों के साथ अन्तःक्रिया करता है इस अवस्था को नैतिक वास्तविकता की अवस्था या दबाब की नैतिक अवस्था भी कहते हैं

 इस अवस्था में बच्चे समझते हैं कि माता-पिता के द्वारा जो कहा जाता है, उन्हें हर हाल में स्वीकार करना होता है 

2 स्वायत्त नैतिकता की अवस्था- इस अवस्था में बालक अपने दोस्तों के साथ अंतः क्रिया करता है तथा बालक समझने लगता है कि नियमों में परिवर्तन किया जा सकता है उनको मानना आवश्यक नहीं है



5- भाषाई विकास सिद्धांत -प्रतिपादक नॉम चॉमस्की

 चॉमस्की एक भाषाविद थे, इन्हें भाषाई विकास का जनक माना जाता है
■ अपने विचारों का आदान प्रदान करने की प्रक्रिया भाषा कहलाती है 
  चॉमस्की के अनुसार भाषा 2 प्रकार  की होती है 
1 प्राथमिक/मातृभाषा - जिस भाषा को बालक बोलना प्रारंभ करता है तथा जिसमें व्याकरण के नियमों की आवश्यकता नहीं होती, उसे मातृभाषा या प्राथमिक भाषा कहते हैं

 2 द्वितीयक भाषा- जिस भाषा को सीखने में व्याकरण के नियमों की आवश्यकता हो, उसे द्वितीयक भाषा कहते हैं

★ चॉमस्की के अनुसार बालक वातावरण में जिस भाषा को सुनता है व्याकरण की दृष्टि से उसे ही सीख लेता है, 

चॉमस्की के अनुसार  बालक को भाषाई ज्ञान सिखाया नहीं जा सकता, क्योंकि उसमें भाषा सीखने की जन्मजात मूल प्रवृत्ति पाई जाती है जिसे चामोस्की ने (LED-Language acquisition device) भाषा अर्जन यंत्र नाम दिया
 ◆ चॉमस्की के अनुसार बालक जिस भाषा को सुनता है उसकी व्याकरण को अपने आप सीख जाता है इसलिए भाषा सीखने की प्रक्रिया को जेनरेटिक ग्रामर थ्योरी के नाम से जाना जाता है
चॉमस्की ने भाषा विकास की दो अवस्थाएं बताई-
     1 प्रारंभिक अवस्था 
     2 वास्तविक अवस्था

★ क्रंदन बालक की प्रथम भाषा मानी जाती है

 आयु                शब्द भंडार
18 माह      -       10 शब्द
2 वर्ष         -        272 शब्द
3 वर्ष         -        1000 शब्द
4 वर्ष         -        1600 शब्द
5 वर्ष         -        2100 शब्द
10 वर्ष       -        5000 शब्द
18 वर्ष       -        80000 शब्द

NOTE- व्हार्फ के द्वारा भाषा सापेक्षता परिकल्पना का संप्रत्यय दिया गया

स्किनर के अनुसार- बालक भाषा अनुकरण व पुनर्बलन सेे सीखता है


6 संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत-  प्रतिपादक - जीन पियाजे


■ संज्ञान प्राणी का ज्ञान है जिसे वह वातावरण या  बाह्य जगत के माध्यम से ग्रहण करता है बालक जैसे-जैसे बड़ा होता है वातावरण के साथ अंतः क्रिया की निरंतर प्रक्रिया के द्वारा संज्ञान का विकास करता है

◆जीन पियाजे को संज्ञानात्मक आंदोलन का जनक माना जाता है 

◆जीन पियाजे को विकासात्मक मनोविज्ञान का जनक माना जाता है

● विकासात्मक मनोविज्ञान में गर्भावस्था से वृद्धावस्था के विकास एवं व्यवहारों का अध्ययन किया जाता है

◆ संज्ञान से आशय बालकों के द्वारा वातावरण से ज्ञान ग्रहण करना, आयु वृद्धि के साथ-साथ वातावरण से ज्ञान ग्रहण करने की प्रक्रिया संज्ञान कहलाती है

◆ जीन पियाजे के अनुसार शैशवावस्था से बालक  अपनी ज्ञानेंद्रियों  द्वारा वातावरण में ज्ञान ग्रहण करता है

★ सोचना,समझना, विचार करना, तर्क करना, चिंतन,       प्रत्यक्षीकरण, अवधान संज्ञान के तत्व कहलाते हैं

■ जीन पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास को समझाने के लिए 4 अवस्थाओं को आधार बताया-
 
1 संवेदी पेशीय अवस्था- 0-2 वर्ष

★ बाह्य वातावरण की जानकारी का अभाव
★ वस्तु स्थायित्व की भावना का अभाव
★ बालक प्रत्येक वस्तु को देखकर, सुनकर, चखकर या स्पर्श करके ज्ञान ग्रहण करता है
★ बालक ज्ञानेंद्रियों द्वारा वातावरण से ज्ञान ज्ञान ग्रहण करता है
■  इस अवस्था में बालक छोटे छोटे शब्दों को बोलने लगता है शिशु पहला सार्थक शब्द लगभग 12 माह में बोलने लगता है परिचितों का मुस्कान के साथ स्वागत करता है  अपरिचितों को देखकर भय का प्रदर्शन करता है

2 पूर्व संक्रियात्मक अवस्था - 2-7 वर्ष
◆ अनुकरण द्वारा सीखना
◆ गिनती गिनना
◆ अक्षर लिखना
◆ वस्तुओं को क्रम में रखना, नाम बताना
◆ माता पिता की आज्ञा पालना सीख जाता है

■ जीन पियाजे के अनुसार इस अवस्था में बालकों में चिंतन की योग्यता का विकास हो जाता है इसलिए इसे अतार्किक चिंतन की व्यवस्था भी कहते हैं
★ इस अवस्था में बालक को में प्रतीकात्मक भावना का विकास हो जाता है इस कारण बालक निर्जीव वस्तुओं में भी सजीव कल्पनाएं करने लगता है

■ इस अवस्था को दो भागों में बांटा गया है-
 
A. प्राक संप्रत्यात्मक अवधि- (2-4 वर्ष ) 

● अनुकरण 
● प्रतिमूर्ति निर्माण
● आत्मकेंद्रिता (Ego centrism)
● जीववाद (Animism)
 
B. अंतर्ज्ञान अवधि- (4-7वर्ष )

● इस अवस्था में बालक अपने अंदर उठे सभी प्रश्नों के जवाब जानना चाहता है इसलिए इसे प्रसन्न पूछने की अवस्था भी कहा जाता है
● इस अवस्था में शिशु अक्षर लिखना,गिनती गिनना,वस्तुओं को क्रम में रखना, हल्के भारी का ज्ञान होना,  माता पिता की आज्ञा मानना, घर के छोटे कामों में मदद करना आदि सीख जाता है 
● इसे तार्किक चिंतन की व्यवस्था भी कहते हैं
 ★ इस अवस्था में अनुत्क्रमणशीलता पाई जाती है इसलिए इसे अपलटावी अवस्था के नाम से भी जाना जाता है

3-मूर्त  संक्रियात्मक अवस्था - 7-12 वर्ष  

■ तार्किक चिंतन की अवस्था है परंतु यह चिंतन प्रत्यक्ष वस्तुओं के साथ ही होता है
■ इस अवस्था में बालक वस्तुओं में तुलना करना प्रारंभ कर देता है 
■ इस अवस्था में बालक  दिन, दिनांक माह, एवं वर्ष की गणना करना सीख जाता है 
■ भाषाई विकास पूर्ण हो जाता है 
■ संप्रेषण योग्यता का विकास हो जाता है
★ इस अवस्था में उत्क्रमणशीलता पाई जाती है इसलिए इसे पलटावी भी कहते हैं

4- औपचारिक क्रियात्मक अवस्था - 12 वर्ष के बाद  
● अमूर्त चिंतन की अवस्था
●  बालक वातावरणीय समस्याओं का समाधान करने लगता है
● दिवा स्वपन की अधिकता पाई जाती है
● इस अवस्था में किशोरों के चिंतन में वस्तुनिष्ठता तथा वास्तविकता की भूमिका बढ़ जाती है


■ जीन पियाजे ने संवेदी पेशीय अवस्था की 6  उप अवस्था बताई है

जीन पियाजे का शिक्षा के क्षेत्र में योगदान

    जीन पियाजे ने बाल केंद्रित शिक्षा प्रणाली पर बल दिया जीन पियाजे ने स्कीमा के समान समान बुद्धि की तुलना कर एक नवीन आयाम प्रस्तुत किया

 जीन पियाजे ने लिखा कि शिक्षकों को बालक  की समस्याओं का तत्काल समाधान कर अधिगम योग्य वातावरण का निर्माण करना चाहिए

 जीन पियाजे ने शिक्षा के क्षेत्र में नवीन संप्रत्यय प्रस्तुत किए

अनुकूलन - बालकों द्वारा वातावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करने की प्रक्रिया अनुकूलन कहलाती है इस प्रक्रिया में व्यक्ति स्वयं को वातावरण के अनुसार डालने में सफल हो जाता है 
जीन पियाजे ने अनुकूलन की दो प्रक्रिया बताई 1आत्मसात करण 2 समायोजन 

साम्यधारण-   आत्मसातकरण एवं समायोजन के मध्य संतुलन बनाने की प्रक्रिया साम्यधारण कहलाती है 
इस प्रक्रिया में पूर्व अनुभव एवं वातावरण के साथ संतुलन का प्रयास किया जाता है

3- संरक्षण - वातावरण में होने वाले परिवर्तन के कारण किसी वस्तु के मूल स्वरूप में होने वाले परिवर्तन को वस्तु के मूल स्वरूप से अलग कर पहचानने की प्रक्रिया सरंक्षण चलाती है

4- संज्ञानात्मक संरचना - बालकों की मानसिक संरचना का सेट संज्ञानात्मक सरंचना कहलाता है, इस संप्रत्यय में बालकों की मानसिक योग्यता का निर्धारण किया जाता है

मानसिक संक्रिया - बालकों के द्वारा किसी समस्या का समाधान करने हेतु चिंतन करने की प्रक्रिया मानसिक संक्रिया कहलाती है इस संपत्ति में बालकों की समस्या समाधान की योग्यता का निर्धारण होता है

6- स्कीम्स- किसी व्यवहार को बार-बार एक ही रूप में दोहराने का पैटर्न ही स्कीम्स कहलाता है

स्कीमा- 

बालक बालिकाओं की मानसिक संरचना का व्यवहार गत परिवर्तन सीमा कहलाता है 

या 

बालकों की मानसिकता का ज्ञानात्मक पैकेट स्कीमा कहलाता है 

या 

किसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु स्वयं की मानसिक संरचना में परिवर्तन करने की प्रक्रिया स्कीमा कहलाती है

या

वातावरण द्वारा अर्जित संपूर्ण ज्ञान का संगठन ही स्कीमा है
 जैसे डाकू रत्नाकर का बाल्मीकि बनना

विकेन्द्रण - किसी भी विषय वस्तु के संदर्भ में वस्तुनिष्ठ या वास्तविक रूप से चिंतन करने की प्रक्रिया विकेन्द्रण  कहलाती है
■ जीन पियाजे को स्कीमा संप्रदाय का जनक माना जाता है


7 सामाजिक संज्ञानात्मक सिद्धांत- प्रवर्तक - लेव वाइगोत्सकी

 ★ वाइगोत्सकी का मानना है की बालक के विकास पर
सामाजिक कारको का प्रभाव पड़ता है इसके अलावा वाइगोत्सकी संस्कृति पर भी जोर देते हैं इसलिए इनका सिद्धांत सामाजिक सांस्कृतिक सिद्धांत कहलाता है 
★वाइगोत्सकी के अनुसार बालक समाजिक अन्तः क्रिया के माध्यम से सीखते हैं
■वाइगोत्सकी के अनुसार भाषा व चिंतन अलग-अलग होते हैं लेकिन बाद में यह दोनों एक-दूसरे पर निर्भर हो जाते हैं

समीपस्थ विकास का क्षेत्र (ZPD)-
● बालकों के द्वारा स्वतंत्र रूप से किए जाने वाले कार्यों तथा सहायता के साथ करने वाले कार्यों के बीच के अंतर को समीपस्थ विकास का क्षेत्र कहते हैं 
बालक अपने वास्तविक स्तर से आगे जाकर समस्याओं का समाधान कर सकते हैं और यदि उन्हें थोड़ा निर्देश मिल जाए तो इस स्तर को वाइगोत्सकी ने संभावित विकास कहा है
 बालक के वास्तविक विकास स्तर और संभावित विकास स्तर के बीच के अंतर को समीपस्थ विकास का क्षेत्र कहते हैं

स्कैफोल्डिंग (  मचान)- बालक को सहयोग एवं निर्देशन के माध्यम से विस्तारित करना पड़ता है और बालकों को कई कौशलों में प्रवीण किया जाता है तो उसे स्कैफोल्डिंग कहते हैं




8 समाजिक-संवेगिक परिस्थितिपरक सिद्धांत -
 प्रवर्तक -  यूरी ब्रोनफेनब्रेनर
★इस सिद्धांत के अनुसार हम हमारे जीवन में अलग-अलग वातावरण का सामना करते हैं जो कि हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं 
★अलग-अलग वातावरण की व्याख्या करते हुए इस सिद्धांत को पांच मंडलों द्वारा समझाया गया है-

लघु मंडल - माता-पिता, शिक्षक, संगीसाथी

2 मध्य मंडल- लघु मंडल के कारकों का आपसी संबंध

3 बाह्य मंडल -पड़ोसी, जनसंचार माध्यम, पारिवारिक मित्र, माता-पिता का कार्यस्थल आदि

4 वृहत मंडल- मूल्य रीति-रिवाज, परंपरा आदी

5 घटना मंडल-   जीवन क्रम की घटनाएं


9 मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत -प्रतिपादक सिगमंड फ्रायड 

●फ्रायड के अनुसार व्यक्ति अपनी दमित इच्छाओं की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कार्य करता है प्रत्येक व्यक्ति का कार्य अचेतन मन से ही प्रारंभ होता है कार्य करते समय व्यक्ति चेतन मन में होता है और व्यक्ति को जीवन में मिलने वाली असफलताएं अर्द्धचेतन मन के माध्यम से प्राप्त होती है 

■सिगमंड फ्रायड ने मन के तीन भागों का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया सिगमंड फ्रायड ने मन के तीन भाग बताएं-

1 चेतन मन- मस्तिष्क की जागृत अवस्था चेतन कहलाती है फ्राइड ने चेतन मन का कुल भाग 12.5% या 1/10 भाग माना है


2 अचेतन मन- दमित इच्छाओं, आवश्यकता एवं गुणों का भंडार गृह अचेतन  मन होता है
 मन का वह भाग जो अपना ध्यान विषय वस्तु पर केंद्रित ने कर बाह्य जगत में विचरण करता हो अचेतन मन कहलाता है
◆ सिगमंड फ्रायड के अनुसार व्यक्ति की बुद्धि का संबंध अचेतन मन से होता है और अचेतन मन का कुल भाग 87.5% या 9/10 भाग होता है


3अर्द्धचेतन मन-  पूर्व में सीखी गई विषय वस्तु का समय पर ध्यान में न आ कर कुछ बाधाओं के बाद ध्यान में आना अर्द्धचेतन मन कहलाता है

सिगमंड फ्रायड ने व्यक्तित्व निर्माण के आधार पर चेतन मन की तीन अवस्थाएं बताई-

1= ID

● अचेतन मन से संबंध
● को समायोजन के लिए जिम्मेदार
● भोग विलास व्यवस्था
● इच्छाओं का भंडार ग्रह
● सुखवादी सिद्धांत/ निरंकुशवादी सिद्धांत पर आधारित
● पशु प्रवृत्ति पर आधारित

2 = EGO

● चेतन मन से संबंधित
● वास्तविकता का परिचायक
● संतुलन स्थापन की अवस्था
● समायोजन की दशा
● मन का वकील
● व्यक्तित्व का कार्यपालक

3 = SUPER EGO

● आदर्शवादी सिद्धांत
● कुसमायोजन की दशा
● आध्यात्मिकता की ओर रुझान
● नैतिक व आदर्शवादी बातें
● आध्यात्मिक गुणों की अधिकता से व्यक्ति कुसमायोजित हो जाता है


सिगमंड फ्रायड ने दो प्रकार की मूल प्रवृत्ति बताई
1 जीवन मूलक/ जिजीविषा
2 मृत्यु मुलक/ मूमुर्षा
 
■  नार्सीसीज्म- आत्मप्रेम या स्वमोह  की प्रक्रिया को  सिगमंड फ्रायड ने नार्सीसीज्म नाम दिया

■  लिबिडो-   सिगमंड फ्रायड ने लैंगिक ऊर्जा या कामुकता की भावना को लिबिडो नाम दिया

■ ऑडिपस व इलेक्ट्रा ग्रंथि-  शैशवावस्था के अंत में ओर बाल्यावस्था के प्रारंभ के मध्य बालकों में ऑडिपस ओर  बालिकाओं में इलेक्ट्रा ग्रंथियों का विकास हो जाता है इस कारण बालक अपनी मां से तथा बालिका अपने पिता के प्रति श्रद्धा भाव प्रकट करते हैं

■ वय:संधि काल-  बाल्यावस्था के अंत में ओर किशोरावस्था के प्रारंभ के मध्यकाल में बालकों की शारीरिक संरचना में होने वाले परिवर्तन के काल को  वय:संधि काल कहते हैं


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