भाषा शिक्षण शिक्षण विधियां
भाषा शिक्षण
कौशल = अध्यापक में उपस्थित ज्ञान को विद्यार्थियों के अपेक्षित स्तर तक ले जाने की प्रक्रिया कौशल कहलाती है जो कि प्रशिक्षण द्वारा विकसित होती है
■ अध्यापक को इन कौशलों का प्रशिक्षण दिया जाना सूक्ष्म शिक्षण में गिना जाता है
सूक्ष्म शिक्षण = शिक्षण की ऐसी प्रविधि जो नियंत्रित स्थितियों में पूर्ण होती है सूक्ष्म शिक्षण कहलाती है
■ सर्वप्रथम अमेरिकी शिक्षा शास्त्री W ऐलन महोदय ने 1954 से 1960 के मध्य इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया, उन्होंने माना कि परंपरागत शिक्षण की नीरस विधियों को बदलकर नवाचार की आवश्यकता है जिसके लिए अध्यापकों को प्रशिक्षण की बेहद आवश्यकता होती है
■ इस विचार को गति प्रदान करने हेतु स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के 2 विद्यार्थी कीथ व एचीसन ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया, उन्होंने 1961 में यह योजना कक्षा कक्ष में लागू कर दी
■ इसके आशा अनुरूप परिणाम आने के पश्चात 1963 में इसे व्यापक स्तर पर लागू किया गया
■भारत में NCERT (1961 में स्थापना) ने उच्च अध्ययन शिक्षा केंद्र, बड़ौदा के सहयोग से 1975 में लागू किया
■ यह कक्षा शिक्षण की प्रविधि नहीं बल्कि प्रशिक्षण की तकनीक है इसमें एक समय में एक ही कौशल का अभ्यास कराया जाता है
■ इसमें 5 से 10 मिनट की पाठ योजना बनाई जाती है, बनाये गए पाठ को 5 से 10 से सहपाठियों के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है
■सहपाठी निरीक्षण कर्ता की भूमिका निभाते हैं
■ अध्यापक केवल परामर्श की भूमिका निभाता है
■ यह प्रक्रिया एक चक्र के रूप में चलती है जिसे पुनः पुनः शिक्षण कहा जाता है
( पाठ योजना ---- प्रस्तुतीकरण --- प्रतिपुष्टि ---- पुनः पाठ योजना ---- पुनः प्रस्तुतीकरण ---- पुनः प्रतिपुष्टि )
■ सूक्ष्म शिक्षण में एक कौशल में दक्षता प्राप्त कर लेने के बाद अगले कौशल का अभ्यास कराया जाता है इसके द्वारा अध्यापक के आत्मविश्वास में वृद्धि होती है
■ सभी कौशल सीख जाने के बाद अध्यापक कक्षा में इसका समुचित प्रयोग करता है इसकी सहायता से शिक्षण प्रभावी होता है तथा वातावरण भी प्रभावी बनता है
■ विद्यार्थियों की रुचि में वृद्धि होती है जिससे निर्धारित उद्देश्य आसानी से प्राप्त हो जाते हैं यह विद्यार्थियों के व्यवहार परिवर्तन में सहायक सिद्ध होते हैं
दोष
1 बार-बार एक ही कौशल का अभ्यास कराए जाने के कारण प्रशिक्षण प्राप्त करता के लिए यह नीरस बन जाती है
2 समय ज्यादा लगता है, खर्च बढ़ता है
3अधिगमकर्ता को एक समय में एक ही कौशल का अभ्यास कराया जाता है अतः एक साथ सामंजस्य बैठाना कठिन है
4 यह कक्षा कक्ष के लिए भी अनुपयोगी विधि है साथ ही विद्यार्थियों के लिए भी अनुपयोगी विधि है
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