संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत

संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत

   प्रतिपादक - जीन पियाजे

◆जीन पियाजे को संज्ञानात्मक आंदोलन का जनक माना जाता है 

◆जीन पियाजे को विकासात्मक मनोविज्ञान का जनक माना जाता है

● विकास विकासात्मक मनोविज्ञान में गर्भावस्था से वृद्धावस्था के विकास एवं व्यवहारों का अध्ययन किया जाता है

◆ संज्ञान से आशय बालकों के द्वारा वातावरण से ज्ञान ग्रहण करना, आयु वृद्धि के साथ-साथ वातावरण से ज्ञान ग्रहण करने की प्रक्रिया संज्ञान कहलाती है

◆ जीन पियाजे के अनुसार शैशवावस्था से बालक  अपनी ज्ञानेंद्रियों  द्वारा वातावरण में ज्ञान ग्रहण करता है

★ सोचना,समझना, विचार करना, तर्क करना, चिंतन,       प्रत्यक्षीकरण, अवधान संज्ञान के तत्व कहलाते हैं

■ जीन पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास को समझाने के लिए 4 अवस्थाओं को आधार बताया
 1 संवेदी पेशीय अवस्था- 0-2 वर्ष
★बाह्य वातावरण की जानकारी का अभाव
★ वस्तु स्थायित्व की भावना का अभाव
★ बालक प्रत्येक वस्तु को देखकर, सुनकर, चखकर या स्पर्श करके ज्ञान ग्रहण करता है
★ बालक ज्ञानेंद्रियों द्वारा वातावरण से ज्ञान ज्ञान ग्रहण करता है
2 पूर्व संक्रियात्मक अवस्था - 2-7 वर्ष
◆ अनुकरण द्वारा सीखना
◆ बालक गिनती गिनना
◆ अक्षर लिखना
◆ वस्तुओं को क्रम में रखना, नाम बताना
◆ माता पिता की आज्ञा पालना सीख जाता है
■ जीन पियाजे के अनुसार इस अवस्था में बालकों में चिंतन की योग्यता का विकास हो जाता है इसलिए इसे  अतार्किक चिंतन की व्यवस्था भी कहते हैं
★ इस अवस्था में बालक को में प्रतीकात्मक भावना का विकास हो जाता है इस कारण बालक निर्जीव वस्तुओं में भी सजीव कल्पनाएं करने लगता है
 
3-मूर्त  संक्रियात्मक अवस्था - 7-12 वर्ष  
■ तार्किक चिंतन की अवस्था है परंतु यह चिंतन प्रत्यक्ष वस्तुओं के साथ ही होता है
■ इस अवस्था में बालक वस्तुओं में तुलना करना प्रारंभ कर देता है 
■ इस अवस्था में बालक  दिन, दिनांक माह, एवं वर्ष की गणना करना सीख जाता है 
■ भाषाई विकास पूर्ण हो जाता है 
■ संप्रेषण योग्यता का विकास हो जाता है

4- औपचारिक क्रियात्मक अवस्था - 12 वर्ष के बाद  
● अमूर्त चिंतन की अवस्था
●  बालक वातावरणीय समस्याओं का समाधान करने लगता है
● दीवा स्वपन की अधिकता पाई जाती है

■ जीन पियाजे ने संवेदी पेशीय अवस्था की 6  उप अवस्था बताई है तथा पूर्व संक्रियात्मक अवस्था को 2 भागों में विभक्त किया है

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