1 मनोसामाजिक विकास सिद्धांत : प्रतिपादक - एरिक इरिक्सन
■ प्रारंभिक दशा में इरिक्सन व फ्रॉयड के सिद्धांत में काफी समानता थी तथा इरिक्सन, सिगमंड फ्रायड के सिद्धांत का समर्थक भी था,
★ इरिकसन का मानना है कि बालक के विकास पर काम-प्रवृत्ति का नहीं बल्कि सामाजिक अनुभूतियों का प्रभाव पड़ता है
★ इरिक्सन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘childhood and society, 1963’ में मनोसामाजिक विकास की 8 अवस्थाएं बताई-
Trick - विश्वास और स्वतंत्रता के साथ पहल की किंतु अहंकारी बन गए फिर परिश्रम करके पहचान बनाई तो घनिष्ठता मिली और जनन भी संपूर्ण हुुआ
1- विश्वास बना अविश्वास (0-2 वर्ष)
2- स्वतंत्रता बनाम लज्जा (3 से 4 वर्ष)
3- पहल बनाम दोषिता (4 से 6 वर्ष)
4- परिश्रम बनाम हीनता (7 से 12 वर्ष)
5 पहचान बनाम भूमिका भ्रांति (13 से 19 वर्ष)
6 घनिष्ठता बनाना अलगाव ( 19 से 35 वर्ष)
7 उत्पादकता बनाम निष्क्रियता (36 से 55 वर्ष)
8 सम्पूर्णता बनाम नैराश्य ( 55 वर्ष के बाद)
एरिक्सन के सिद्धांत के गुण-
- समाज एवं व्यक्ति की भूमिका पर बल- एरिक्सन के व्यक्तित्व सिद्धान्त की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इन्होंने व्यक्तित्व के विकास एवं संगठन को स्वस्थ करने में सामाजिक कारकों एवं स्वयं व्यक्ति की भूमिका को समान रूप से स्वीकार किया हैै
- किशोरवस्था को महत्त्वपूर्ण स्थान- एरिकसन किशोरावस्था व्यक्तित्व के विकास की अत्यन्त संवेदनशील अवस्था होती है। इस दौरान अनेक महत्त्वपूर्ण शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक परिवर्तन होता है
- आशावादी दृष्टिकोण -एरिक्सन का मानना है कि प्रत्येक अवस्था में व्यक्ति की कुछ कमियाँ एवं सामथ्र्य होती है। अत: व्यक्ति यदि एक अवस्था में असफल हो गया तो इसका आशय यह नहीं है कि वह दूसरी अवस्था में भी असफल ही होगा, क्योंकि खामियों के साथ-साथ सामथ्र्य भी विद्यमान है, जो प्राणी को निरन्तर आगे बढ़ने के लिये प्रेरित करता है।
- जन्म से लेकर मृत्यु तक की मनोसामाजिक घटनाओं को शामिल करना- एरिक्सन ने अपने सिद्धान्त में व्यक्तित्व के विकास एवं समन्वय की व्याख्या करने में व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक की मनोसामाजिक घटनाओं को शामिल किया है, जो इसे अन्य सिद्धान्तों से अत्यधिक विशिष्ट बना देता है
2 मनोलैंगिक विकास सिद्धांत = प्रतिपादक - सिगमंड फ्रायड
● सिगमंड फ्रायड बाल विकास का आधार लैंगिक ऊर्जा, कामुकता, लिबिडो को मानते थे परंतु इस बात से उनके शिष्य कार्ल युंग सहमत नहीं थे और उन्होंने विश्लेषणात्मक सिद्धांत का प्रतिपादन किया
■ सिगमंड फ्रायड ने मनो लैंगिक विकास की 5 अवस्थाये बताई-
1= मुखावस्था- 0 से 1वर्ष
● लैंगिक उर्जा बालक के मुख में होती है
● बालक प्रत्येक वस्तु को मुख में लेने की कोशिश करता है
ऐसा होने पर वयस्कावस्था में दो प्रकार के व्यक्तित्व विकसित होते हैं-
★ मुखवर्ती निष्क्रिय
★ मुखवर्ती आक्रामक
2= गुदावस्था- 1 से 3 वर्ष
●इस अवस्था में लैंगिक उर्जा बालक के गुदीय क्षेत्र में पाई जाती है लैंगिक उर्जा के प्रभाव से बालक आक्रामक, जिद्दी व धारणात्मक प्रवृत्ति का हो जाता है
● इस अवस्था में बालक मल- मूत्र संबंधी क्रियाओं में आनंद लेता है इस अवस्था में लैंगिक संतुष्टि के कम या अधिक होने पर व्यक्ति का व्यवहार अव्यवस्थित व अति व्यवस्थित हो जाता है
3= लैंगिक अवस्था - 3 से 6 वर्ष
●इस अवस्था में लैंगिक उर्जा बालकों में केंद्र की ओर अग्रसर होती है , काम परवर्ती लैंगिक क्षेत्र में विद्यमान रहती है
★इनमें इलेक्ट्रा व औडिपस ग्रंथि का विकास हो जाता है, जिसके कारण लड़की अपने पिता से ओर लड़का अपनी माता से अधिक प्रेम करता है
■ इस अवस्था में कम या अधिक लैंगिक संतुष्टि होने पर व्यस्क अवस्था में व्यक्ति योन रोग से ग्रसित हो जाता है
4= अदृश्य अवस्था- 7 से 12 वर्ष
● इस अवस्था में बालकों में लैंगिक ऊर्जा निष्क्रिय हो जाती है इस कारण उसमें समलैंगिक प्रेम पाया जाता है
★लैंगिक ऊर्जा मार्गान्तरित होकर रचनात्मक कार्यों की ओर अग्रसर हो जाती है
5= जननेंद्रिय अवस्था - 12 वर्ष के बाद
● इसमें विषमलिंगी प्रेम की प्रधानता हो जाती है तथा व्यक्ति में लैंगिक परिपक्वता आ जाती है
● सिगमंड फ्रायड के अनुसार इस अवस्था में कामुकता संतानोत्पत्ति की ओर अग्रसर होती है
3 नैतिक विकास का सिद्धांत =प्रतिपादक - लॉरेंस कोहलबर्ग
★ कोहलबर्ग के अनुसार बालकों के नैतिक विकास को समझने से पूर्व बालकों की चिंतन तर्क एवं निर्णय करने की क्षमता को समझना व उसका विश्लेषण करना आवश्यक है क्योंकि उनके नैतिक विकास का आधार तर्क चिंतन और निर्णय क्षमता को ही माना जाता है
■ कोहलबर्ग ने नैतिक विकास की 6 अवस्थाएं एवं उनके 3 स्तर बताए-
1 प्री कनवेंशनल स्तर - 4 से 10 वर्ष
इस स्तर में बालकों के तर्क चिंतन एवं निर्णय का आधार बाह्य वातावरण में घटित होने वाली घटनाओं को माना जाता है
(a) आज्ञा व दंड की अवस्था
(b) अहंकार की अवस्था
2 कन्वेंशनल स्तर- 10 से 13 वर्ष
इस सफर में बालकों के तरफ चिंतन एवं निर्णय का आधार समाजिक घटनाओं को माना जाता है
(C) उत्तम लड़का लड़की की अवस्था
(d) सामाजिक परंपराओं के मान्यता की अवस्था
3 पोस्ट कन्वेंशनल स्तर- 13 वर्ष से ऊपर
इस स्तर में बालक के तरफ चिंतन व निर्णय का आधार उनका स्वयं का विवेक माना जाता है
(e) सामाजिक समझौते की अवस्था
(F) उच्चतम विवेक की अवस्था
■ कोहलबर्ग ने पुनः अपने नैतिक विकास की पांच नवीन अवस्थाएं बताई -
1 पूर्व नैतिक विकास की अवस्था (0-2वर्ष)
2 स्वकेंद्रित अवस्था (2-7वर्ष)
3 परंपराओं को धारण करने की अवस्था (7-12वर्ष)
4 आधारहीन आत्म चेतना की अवस्था (13-18 वर्ष)
5 आधार युक्त आत्म चेतना की अवस्था (19 के बाद)
4 नैतिक विकास का सिद्धांत =प्रवर्तक - जीन पियाजे
■ जीन पियाजे ने नैतिक विकास का वैज्ञानिक अध्ययन 1928 में प्रारंभ किया पता 1932 में एक पुस्तक मोरल जजमेंट ऑफ़ चाइल्ड प्रकाशित की जीन पियाजे के अनुसार बच्चे जैसे-जैसे वातावरण के साथ अंतः क्रिया करते हैं वैसे-वैसे अपने में परिवर्तन व परिमार्जन लाते हैं और उनका नैतिक विकास होता है
■ जीन पियाजे ने नैतिक विकास सिद्धांत की दो अवस्थाएं बताई-
1 परायत्त नैतिकता की अवस्था- इस अवस्था में बालक अपने से बड़ों के साथ अन्तःक्रिया करता है इस अवस्था को नैतिक वास्तविकता की अवस्था या दबाब की नैतिक अवस्था भी कहते हैं
इस अवस्था में बच्चे समझते हैं कि माता-पिता के द्वारा जो कहा जाता है, उन्हें हर हाल में स्वीकार करना होता है
2 स्वायत्त नैतिकता की अवस्था- इस अवस्था में बालक अपने दोस्तों के साथ अंतः क्रिया करता है तथा बालक समझने लगता है कि नियमों में परिवर्तन किया जा सकता है उनको मानना आवश्यक नहीं है
5- भाषाई विकास सिद्धांत -प्रतिपादक नॉम चॉमस्की
★चॉमस्की एक भाषाविद थे, इन्हें भाषाई विकास का जनक माना जाता है
■ अपने विचारों का आदान प्रदान करने की प्रक्रिया भाषा कहलाती है
★ चॉमस्की के अनुसार भाषा 2 प्रकार की होती है
1 प्राथमिक/मातृभाषा - जिस भाषा को बालक बोलना प्रारंभ करता है तथा जिसमें व्याकरण के नियमों की आवश्यकता नहीं होती, उसे मातृभाषा या प्राथमिक भाषा कहते हैं
2 द्वितीयक भाषा- जिस भाषा को सीखने में व्याकरण के नियमों की आवश्यकता हो, उसे द्वितीयक भाषा कहते हैं
★ चॉमस्की के अनुसार बालक वातावरण में जिस भाषा को सुनता है व्याकरण की दृष्टि से उसे ही सीख लेता है,
चॉमस्की के अनुसार बालक को भाषाई ज्ञान सिखाया नहीं जा सकता, क्योंकि उसमें भाषा सीखने की जन्मजात मूल प्रवृत्ति पाई जाती है जिसे चामोस्की ने (LED-Language acquisition device) भाषा अर्जन यंत्र नाम दिया
◆ चॉमस्की के अनुसार बालक जिस भाषा को सुनता है उसकी व्याकरण को अपने आप सीख जाता है इसलिए भाषा सीखने की प्रक्रिया को जेनरेटिक ग्रामर थ्योरी के नाम से जाना जाता है
★चॉमस्की ने भाषा विकास की दो अवस्थाएं बताई-
1प्रारंभिक अवस्था
2 वास्तविक अवस्था
★ क्रंदन बालक की प्रथम भाषा मानी जाती है
आयु शब्द भंडार
18 माह - 10 शब्द
2 वर्ष - 272 शब्द
3 वर्ष - 1000 शब्द
4 वर्ष - 1600 शब्द
5 वर्ष - 2100 शब्द
10 वर्ष - 5000 शब्द
18 वर्ष - 80000 शब्द
NOTE- व्हार्फ के द्वारा भाषा सापेक्षता परिकल्पना का संप्रत्यय दिया गया
स्किनर के अनुसार- बालक भाषा अनुकरण व पुनर्बलन सेे सीखता है
6 संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत- प्रतिपादक - जीन पियाजे
संज्ञान प्राणी का ज्ञान है जिसे वह वातावरण या बाह्य जगत के माध्यम से ग्रहण करता है बालक जैसे-जैसे बड़ा होता है वातावरण के साथ अंतः क्रिया की निरंतर प्रक्रिया के द्वारा संज्ञान का विकास करता है
◆जीन पियाजे को संज्ञानात्मक आंदोलन का जनक माना जाता है
◆जीन पियाजे को विकासात्मक मनोविज्ञान का जनक माना जाता है
● विकासात्मक मनोविज्ञान में गर्भावस्था से वृद्धावस्था के विकास एवं व्यवहारों का अध्ययन किया जाता है
◆ संज्ञान से आशय बालकों के द्वारा वातावरण से ज्ञान ग्रहण करना, आयु वृद्धि के साथ-साथ वातावरण से ज्ञान ग्रहण करने की प्रक्रिया संज्ञान कहलाती है
◆ जीन पियाजे के अनुसार शैशवावस्था से बालक अपनी ज्ञानेंद्रियों द्वारा वातावरण में ज्ञान ग्रहण करता है
★ सोचना,समझना, विचार करना, तर्क करना, चिंतन, प्रत्यक्षीकरण, अवधान संज्ञान के तत्व कहलाते हैं
■ जीन पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास को समझाने के लिए 4 अवस्थाओं को आधार बताया-
1 संवेदी पेशीय अवस्था- 0-2 वर्ष
★ बाह्य वातावरण की जानकारी का अभाव
★ वस्तु स्थायित्व की भावना का अभाव
★ बालक प्रत्येक वस्तु को देखकर, सुनकर, चखकर या स्पर्श करके ज्ञान ग्रहण करता है
★ बालक ज्ञानेंद्रियों द्वारा वातावरण से ज्ञान ज्ञान ग्रहण करता है
■ इस अवस्था में बालक छोटे छोटे शब्दों को बोलने लगता है शिशु पहला सार्थक शब्द लगभग 12 माह में बोलने लगता है परिचितों का मुस्कान के साथ स्वागत करता है अपरिचितों को देखकर भय का प्रदर्शन करता है
2 पूर्व संक्रियात्मक अवस्था - 2-7 वर्ष
◆ अनुकरण द्वारा सीखना
◆ गिनती गिनना
◆ अक्षर लिखना
◆ वस्तुओं को क्रम में रखना, नाम बताना
◆ माता पिता की आज्ञा पालना सीख जाता है
■ जीन पियाजे के अनुसार इस अवस्था में बालकों में चिंतन की योग्यता का विकास हो जाता है इसलिए इसे अतार्किक चिंतन की व्यवस्था भी कहते हैं
★ इस अवस्था में बालक को में प्रतीकात्मक भावना का विकास हो जाता है इस कारण बालक निर्जीव वस्तुओं में भी सजीव कल्पनाएं करने लगता है
■ इस अवस्था को दो भागों में बांटा गया है-
1. प्राक संप्रत्यात्मक अवधि - (2-4 वर्ष)
● अनुकरण
● प्रतिमूर्ति निर्माण
● आत्मकेंद्रिता (Ego centrism)
● जीववाद (Animism)
2. अंतर्ज्ञान अवधि- (4-7वर्ष)
● इस अवस्था में बालक अपने अंदर उठे सभी प्रश्नों के जवाब जानना चाहता है इसलिए इसे प्रसन्न पूछने की अवस्था भी कहा जाता है
● इस अवस्था में शिशु अक्षर लिखना,गिनती गिनना,वस्तुओं को क्रम में रखना, हल्के भारी का ज्ञान होना, माता पिता की आज्ञा मानना, घर के छोटे कामों में मदद करना आदि सीख जाता है
● इसे तार्किक चिंतन की व्यवस्था भी कहते हैं
★ इस अवस्था में अनुत्क्रमणशीलता पाई जाती है इसलिए इसे अपलटावी अवस्था के नाम से भी जाना जाता है
3-मूर्त संक्रियात्मक अवस्था - 7-12 वर्ष
■ तार्किक चिंतन की अवस्था है परंतु यह चिंतन प्रत्यक्ष वस्तुओं के साथ ही होता है
■ इस अवस्था में बालक वस्तुओं में तुलना करना प्रारंभ कर देता है
■ इस अवस्था में बालक दिन, दिनांक माह, एवं वर्ष की गणना करना सीख जाता है
■ भाषाई विकास पूर्ण हो जाता है
■ संप्रेषण योग्यता का विकास हो जाता है
★ इस अवस्था में उत्क्रमणशीलता पाई जाती है इसलिए इसे पलटावी भी कहते हैं
4- औपचारिक क्रियात्मक अवस्था - 12 वर्ष के बाद
● अमूर्त चिंतन की अवस्था
● बालक वातावरणीय समस्याओं का समाधान करने लगता है
● दिवा स्वपन की अधिकता पाई जाती है
● इस अवस्था में किशोरों के चिंतन में वस्तुनिष्ठता तथा वास्तविकता की भूमिका बढ़ जाती है
■ जीन पियाजे ने संवेदी पेशीय अवस्था की 6 उप अवस्था बताई है
जीन पियाजे का शिक्षा के क्षेत्र में योगदान
जीन पियाजे ने बाल केंद्रित शिक्षा प्रणाली पर बल दिया जीन पियाजे ने स्कीमा के समान समान बुद्धि की तुलना कर एक नवीन आयाम प्रस्तुत किया
जीन पियाजे ने लिखा कि शिक्षकों को बालक की समस्याओं का तत्काल समाधान कर अधिगम योग्य वातावरण का निर्माण करना चाहिए
जीन पियाजे ने शिक्षा के क्षेत्र में नवीन संप्रत्यय प्रस्तुत किए
1 अनुकूलन - बालकों द्वारा वातावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करने की प्रक्रिया अनुकूलन कहलाती है इस प्रक्रिया में व्यक्ति स्वयं को वातावरण के अनुसार डालने में सफल हो जाता है
जीन पियाजे ने अनुकूलन की दो प्रक्रिया बताई 1आत्मसात करण 2 समायोजन
2 साम्यधारण- आत्मसातकरण एवं समायोजन के मध्य संतुलन बनाने की प्रक्रिया साम्यधारण कहलाती है
इस प्रक्रिया में पूर्व अनुभव एवं वातावरण के साथ संतुलन का प्रयास किया जाता है
3- संरक्षण - वातावरण में होने वाले परिवर्तन के कारण किसी वस्तु के मूल स्वरूप में होने वाले परिवर्तन को वस्तु के मूल स्वरूप से अलग कर पहचानने की प्रक्रिया सरंक्षण चलाती है
4- संज्ञानात्मक संरचना - बालकों की मानसिक संरचना का सेट संज्ञानात्मक सरंचना कहलाता है, इस संप्रत्यय में बालकों की मानसिक योग्यता का निर्धारण किया जाता है
5 मानसिक संक्रिया - बालकों के द्वारा किसी समस्या का समाधान करने हेतु चिंतन करने की प्रक्रिया मानसिक संक्रिया कहलाती है इस संपत्ति में बालकों की समस्या समाधान की योग्यता का निर्धारण होता है
6- स्कीम्स- किसी व्यवहार को बार-बार एक ही रूप में दोहराने का पैटर्न ही स्कीम्स कहलाता है
7 स्कीमा-
बालक बालिकाओं की मानसिक संरचना का व्यवहार गत परिवर्तन सीमा कहलाता है
या
बालकों की मानसिकता का ज्ञानात्मक पैकेट स्कीमा कहलाता है
या
किसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु स्वयं की मानसिक संरचना में परिवर्तन करने की प्रक्रिया स्कीमा कहलाती है
या
वातावरण द्वारा अर्जित संपूर्ण ज्ञान का संगठन ही स्कीमा है
जैसे डाकू रत्नाकर का बाल्मीकि बनना
8 विकेन्द्रण - किसी भी विषय वस्तु के संदर्भ में वस्तुनिष्ठ या वास्तविक रूप से चिंतन करने की प्रक्रिया विकेन्द्रण कहलाती है
■ जीन पियाजे को स्कीमा संप्रदाय का जनक माना जाता है
7 सामाजिक संज्ञानात्मक सिद्धांत- प्रवर्तक - लेव वाइगोत्सकी
★ वाइगोत्सकी का मानना है की बालक के विकास पर
सामाजिक कारको का प्रभाव पड़ता है इसके अलावा वाइगोत्सकी संस्कृति पर भी जोर देते हैं इसलिए इनका सिद्धांत सामाजिक सांस्कृतिक सिद्धांत कहलाता है
★वाइगोत्सकी के अनुसार बालक समाजिक अन्तः क्रिया के माध्यम से सीखते हैं
■वाइगोत्सकी के अनुसार भाषा व चिंतन अलग-अलग होते हैं लेकिन बाद में यह दोनों एक-दूसरे पर निर्भर हो जाते हैं
समीपस्थ विकास का क्षेत्र (ZPD)-
● बालकों के द्वारा स्वतंत्र रूप से किए जाने वाले कार्यों तथा सहायता के साथ करने वाले कार्यों के बीच के अंतर को समीपस्थ विकास का क्षेत्र कहते हैं
बालक अपने वास्तविक स्तर से आगे जाकर समस्याओं का समाधान कर सकते हैं और यदि उन्हें थोड़ा निर्देश मिल जाए तो इस स्तर को वाइगोत्सकी ने संभावित विकास कहा है
बालक के वास्तविक विकास स्तर और संभावित विकास स्तर के बीच के अंतर को समीपस्थ विकास का क्षेत्र कहते हैं
स्कैफोल्डिंग ( मचान)- बालक को सहयोग एवं निर्देशन के माध्यम से विस्तारित करना पड़ता है और बालकों को कई कौशलों में प्रवीण किया जाता है तो उसे स्कैफोल्डिंग कहते हैं
8 समाजिक-संवेगिक परिस्थितिपरक सिद्धांत -
प्रवर्तक - यूरी ब्रोनफेनब्रेनर
★इस सिद्धांत के अनुसार हम हमारे जीवन में अलग-अलग वातावरण का सामना करते हैं जो कि हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं
★अलग-अलग वातावरण की व्याख्या करते हुए इस सिद्धांत को पांच मंडलों द्वारा समझाया गया है-
1 लघु मंडल - माता-पिता, शिक्षक, संगीसाथी
2 मध्य मंडल- लघु मंडल के कारकों का आपसी संबंध
3 बाह्य मंडल -पड़ोसी, जनसंचार माध्यम, पारिवारिक मित्र, माता-पिता का कार्यस्थल आदि
4 वृहत मंडल- मूल्य रीति-रिवाज, परंपरा आदी
5 घटना मंडल- जीवन क्रम की घटनाएं
9 मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत -प्रतिपादक सिगमंड फ्रायड
●फ्रायड के अनुसार व्यक्ति अपनी दमित इच्छाओं की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कार्य करता है प्रत्येक व्यक्ति का कार्य अचेतन मन से ही प्रारंभ होता है कार्य करते समय व्यक्ति चेतन मन में होता है और व्यक्ति को जीवन में मिलने वाली असफलताएं अर्द्धचेतन मन के माध्यम से प्राप्त होती है
■सिगमंड फ्रायड ने मन के तीन भागों का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया सिगमंड फ्रायड ने मन के तीन भाग बताएं-
1 चेतन मन- मस्तिष्क की जागृत अवस्था चेतन कहलाती है फ्राइड ने चेतन मन का कुल भाग 12.5% या 1/10 भाग माना है
2 अचेतन मन- दमित इच्छाओं, आवश्यकता एवं गुणों का भंडार गृह अचेतन मन होता है
मन का वह भाग जो अपना ध्यान विषय वस्तु पर केंद्रित ने कर बाह्य जगत में विचरण करता हो अचेतन मन कहलाता है
◆ सिगमंड फ्रायड के अनुसार व्यक्ति की बुद्धि का संबंध अचेतन मन से होता है और अचेतन मन का कुल भाग 87.5% या 9/10 भाग होता है
3अर्द्धचेतन मन- पूर्व में सीखी गई विषय वस्तु का समय पर ध्यान में न आ कर कुछ बाधाओं के बाद ध्यान में आना अर्द्धचेतन मन कहलाता है
सिगमंड फ्रायड ने व्यक्तित्व निर्माण के आधार पर चेतन मन की तीन अवस्थाएं बताई-
1= ID
● अचेतन मन से संबंध
● को समायोजन के लिए जिम्मेदार
● भोग विलास व्यवस्था
● इच्छाओं का भंडार ग्रह
● सुखवादी सिद्धांत/ निरंकुशवादी सिद्धांत पर आधारित
● पशु प्रवृत्ति पर आधारित
2 = EGO
● चेतन मन से संबंधित
● वास्तविकता का परिचायक
● संतुलन स्थापन की अवस्था
● समायोजन की दशा
● मन का वकील
● व्यक्तित्व का कार्यपालक
3 = SUPER EGO
● आदर्शवादी सिद्धांत
● कुसमायोजन की दशा
● आध्यात्मिकता की ओर रुझान
● नैतिक व आदर्शवादी बातें
● आध्यात्मिक गुणों की अधिकता से व्यक्ति कुसमायोजित हो जाता है
सिगमंड फ्रायड ने दो प्रकार की मूल प्रवृत्ति बताई
1 जीवन मूलक/ जिजीविषा
2 मृत्यु मुलक/ मूमुर्षा
■ नार्सीसीज्म- आत्मप्रेम या स्वमोह की प्रक्रिया को सिगमंड फ्रायड ने नार्सीसीज्म नाम दिया
■ लिबिडो- सिगमंड फ्रायड ने लैंगिक ऊर्जा या कामुकता की भावना को लिबिडो नाम दिया
■ ऑडिपस व इलेक्ट्रा ग्रंथि- शैशवावस्था के अंत में ओर बाल्यावस्था के प्रारंभ के मध्य बालकों में ऑडिपस ओर बालिकाओं में इलेक्ट्रा ग्रंथियों का विकास हो जाता है इस कारण बालक अपनी मां से तथा बालिका अपने पिता के प्रति श्रद्धा भाव प्रकट करते हैं
■ वय:संधि काल- बाल्यावस्था के अंत में ओर किशोरावस्था के प्रारंभ के मध्यकाल में बालकों की शारीरिक संरचना में होने वाले परिवर्तन के काल को वय:संधि काल कहते हैं
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